September 24, 2021

प्रथम विश्व युद्ध के कारण | Pratham vishwa yudh ke karan

आज के इस आर्टिकल में मै आपको ” प्रथम विश्व युद्ध के कारण  | Pratham vishwa yudh ke karan  ” की जानकारी उपलब्ध कराने जा रहा हूँ, जिन्हे आप अध्ययन कर अपने प्रतियोगिता परीक्षा की तैयारी के उपयोग में ला करेंगे, आशा करता हूँ मेरा यह प्रयास आपको जरुर पसंद आएगा। तो चलिए जानते हैं –

Pratham Vishwa yudh ke Karan

Answer – प्रथम विश्व युद्ध के कारण 

  • जर्मनी की नई अंतर्राष्ट्रीय विस्तारवादी नीति: वर्ष 1890 में जर्मनी के नए सम्राट विल्हेम द्वितीय ने एक अंतर्राष्ट्रीय नीति शुरू की, जिसने जर्मनी को विश्व शक्ति के रूप में परिवर्तित करने के प्रयास किये। इसी का परिणाम रहा कि विश्व के अन्य देशों ने जर्मनी को एक उभरते हुए खतरे के रूप में देखा जिसके चलते अंतर्राष्ट्रीय स्थिति अस्थिर हो गई।
  • परस्पर रक्षा सहयोग (Mutual Defense Alliances): संपूर्ण यूरोपियन राष्ट्रों ने आपसी सहयोग के लिये रक्षा समझौते और संधियाँ कर ली। इन संधियों का सीधा सा अर्थ था कि यदि यूरोप के किसी एक राष्ट्र पर शत्रु राष्ट्र की ओर से हमला होता है तो उक्त राष्ट्र की रक्षा हेतु सहयोगी राष्ट्रों को सहायता के लिये आगे आना होगा।
    • त्रिपक्षीय संधि (Triple Alliance), वर्ष 1882  की यह संधि जर्मनी को ऑस्ट्रिया-हंगरी और इटली से जोड़ती है।
    • त्रिपक्षीय सौहार्द (Triple Entente), यह ब्रिटेन, फ्राँस और रूस से संबद्ध था, जो वर्ष 1907 तक समाप्त हो गया।
    • इस प्रकार यूरोप में दो प्रतिद्वंद्वी समूह बन गए।
  • साम्राज्यवाद (Imperialism): प्रथम विश्व युद्ध से पहले अफ्रीका और एशिया के कुछ हिस्से कच्चे माल की उपलब्धता के कारण यूरोपीय देशों के बीच विवाद का विषय बने हुए थे। जब जर्मनी और इटली इस उपनिवेशवादी दौड़ में शामिल हुए तो उनके विस्तार के लिये बहुत कम संभावना बची। इसका परिणाम यह हुआ कि इन देशों ने उपनिवेशवादी विस्तार की एक नई नीति अपनाई। यह नीति थी दूसरे राष्ट्रों के उपनिवेशों पर बलपूर्वक अधिकार कर अपनी स्थिति को सुदृढ़ किया जाए। बढ़ती प्रतिस्पर्द्धा और अधिक साम्राज्यों की इच्छा के कारण यूरोपीय देशों के मध्य टकराव में वृद्धि हुई जिसने समस्त विश्व को प्रथम विश्व युद्ध में धकेलने में मदद की।
    • इसी प्रकार मोरक्को तथा बोस्निया संकट ने भी इंग्लैंड एवं जर्मनी के बीच प्रतिस्पर्द्धा को और बढ़ावा दिया।
    • अपने प्रभाव क्षेत्र में वृद्धि करने के उद्देश्य से जर्मनी ने जब बर्लिन-बगदाद रेल मार्ग योजना बनाई तो इंग्लैंड के साथ-साथ फ्राँस और रूस ने इसका विरोध किया, जिसके चलते  इनके बीच कटुता मेंऔर अधिक वृद्धि हुई।
  • सैन्यवाद (Militarism): 20वीं सदी में प्रवेश करते ही विश्व में हथियारों की दौड़ शुरू हो गई थी। वर्ष 1914 तक जर्मनी में सैन्य निर्माण में सबसे अधिक वृद्धि हुई। ग्रेट ब्रिटेन और जर्मनी दोनों ने इस समयावधि में अपनी नौ-सेनाओं में काफी वृद्धि की। सैन्यवाद की दिशा में हुई इस वृद्धि ने युद्ध में शामिल देशों को और आगे बढ़ने में मदद की।
    • वर्ष 1911 में आंग्ल जर्मन नाविक प्रतिस्पर्द्धा के परिणामस्वरूप ‘अगादिर का संकट’ उत्पन्न हो गया। हालाँकि इसे सुलझाने का प्रयास किया गया परंतु यह प्रयास सफल नहीं हो सका। वर्ष 1912 में जर्मनी में एक विशाल जहाज़ ‘इम्प रेटर’ का निर्माण किया गया जो उस समय का सबसे बड़ा जहाज़ था। इससे इंग्लैंड और जर्मनी के मध्य वैमनस्य एवं प्रतिस्पर्द्धा में वृद्धि हुई।
  • राष्ट्रवाद (Nationalism): जर्मनी और इटली का एकीकरण भी राष्ट्रवाद के आधार पर ही किया गया था। बाल्कन क्षेत्र में राष्ट्रवाद की भावना अधिक प्रबल थी। चूँकि उस समय बाल्कन प्रदेश तुर्की साम्राज्य के अंतर्गत आता था, अतः जब तुर्की साम्राज्य कमज़ोर पड़ने लगा तो इस क्षेत्र में रहने वाले लोगों ने स्वतंत्रता की मांग शुरू कर दी।
    • बोस्निया और हर्जेगोविना में रहने वाले स्लाविक लोग ऑस्ट्रिया-हंगरी का हिस्सा नहीं बना रहना चाहते थे, बल्कि वे सर्बिया में शामिल होना चाहते थे और बहुत हद तक उनकी इसी इच्छा के परिणामस्वरूप प्रथम विश्व युद्ध की शुरुआत हुई। इस तरह राष्ट्रवाद युद्ध का कारण बना।
    • रूस का मानना था कि स्लाव यदि ऑस्ट्रिया-हंगरी एवं तुर्की से स्वतंत्र हो जाता है तो वह उसके प्रभाव में आ जाएगा, यही कारण रहा कि रूस ने अखिल स्लाव अथवा सर्वस्लाववाद आंदोलन को बल दिया। स्पष्ट है कि इससे रूस और ऑस्ट्रिया–हंगरी के मध्य संबंधों में कटुता आई।
    • इसी तरह के और भी बहुत से उदाहरण रहे जिन्होंने राष्ट्रवाद की भावना को उग्र बनाते हुए संबंधों को तनावपूर्ण स्थिति में ला खड़ा किया। ऐसा ही एक उदाहरण है सर्वजर्मन आंदोलन।
  • किसी प्रभावशाली अंतर्राष्ट्रीय संस्था का अभाव
    • प्रथम विश्व युद्ध के पूर्व ऐसी कोई संस्था मौजूद नहीं थी जो साम्राज्यवाद, सैन्यवाद और उग्र राष्ट्रवाद पर नियंत्रण कर विभिन्न राष्ट्रों के बीच संबंधों को सहज बनाने में सहायता कर सके। उस समय विश्व का लगभग प्रत्येक राष्ट्र अपनी मनमानी कर रहा था जिसके चलते यूरोप की राजनीति में एक प्रकार की अराजक स्थिति बन गई।
  • तत्कालीन कारण ‘आर्कड्यूक फ्रांज फर्डिनेंड (Archduke Franz Ferdinand) की हत्या’: जून 1914 में जब ऑस्ट्रिया-हंगरी के सिंहासन के उत्तराधिकारी आर्कड्यूक फ्रांज फर्डिनेंड बोस्निया में साराजेवो का दौरा कर रहे थे, तब उनकी गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। एक सर्बियाई व्यक्ति जिसका यह सोचना था कि ऑस्ट्रिया के बजाय सर्बिया को बोस्निया पर नियंत्रण करना चाहिये, ने आर्कड्यूक की हत्या कर दी। इससे सारा यूरोप सकते में आ गया। ऑस्ट्रिया ने इस घटना के लिये सर्बिया को उत्तरदायी माना। ऑस्ट्रिया ने सर्बिया को चेतावनी दी कि वह 48 घंटे के अंदर इस घटना के संदर्भ में अपनी स्थिति स्पष्ट कर अपराधियों का दमन करे। लेकिन सर्बिया ने ऑस्ट्रिया की मांग को ठुकरा दिया। परिणामस्वरूप 28 जुलाई, 1914 को ऑस्ट्रिया ने सर्बिया के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी। देखते-ही-देखते विश्व के अन्य राष्ट्र भी अपने-अपने गुटों के समर्थन में उतर आए और युद्ध विकराल होता चला गया। नतीजतन:
    • इस युद्ध में रूस भी शामिल हो गया क्योंकि उसने सर्बिया के साथ संधि कर रखी थी।
    • इसके बाद जर्मनी ने रूस के साथ युद्ध की घोषणा कर दी क्योंकि जर्मनी और ऑस्ट्रिया-हंगरी के मध्य संधि हुई थी।
    • इसके बाद ब्रिटेन ने जर्मनी के साथ युद्ध की घोषणा कर दी क्योंकि जर्मनी ने तटस्थ बेल्जियम पर आक्रमण कर दिया था, जबकि ब्रिटेन ने बेल्जियम और फ्राँस दोनों देशों की रक्षा के लिये समझौते किये हुए थे।
  • युद्ध के दौरान हुए कुछ प्रमुख युद्धों में मार्ने का प्रथम युद्ध, सोम्मे का युद्ध, टैनबर्ग का युद्ध, गैलीपोली का युद्ध और वर्दुन का युद्ध आदि शामिल थे।
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