Indian forest act 1927

धारा 1 - संक्षिप्त नाम और विस्तार
(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम भारतीय वन अधिनियम, 1927 है ।

(2) इसका विस्तार उन राज्यक्षेत्रों को छोड़कर, जो प्रथम नवम्बर, 1956 से ठीक पूर्व भाग ख राज्यों में समाविष्ट थे, संपूर्ण भारत पर है ।

(3) यह उन राज्यक्षेत्रों को लागू है जो प्रथम नवम्बर, 1956 से ठीक पूर्व बिहार, मुम्बई, कुर्ग, दिल्ली, मध्य प्रदेश, उड़ीसा, पंजाब, उत्तर प्रदेश तथा पश्चिमी बंगाल में समाविष्ट थे, किन्तु किसी भी राज्य की सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा इस अधिनियम को उस पूर्ण राज्य में या उसके किसी विनिर्दिष्ट भाग में, जिस पर इसका विस्तार है और जहां पर यह प्रवर्तन में नहीं है, प्रवर्तन3 में ला सकेगी ।]

धारा 2 - निर्वचन खण्ड

इस अधिनियम में, जब तक कि कोई बात विषय या संदर्भ से विरुद्ध न हो, –

(1) “पशु” के अन्तर्गत हाथी, ऊंट, भैंसे, घोड़े, घोड़ियां, खस्सी, पशु, टट्टू बछेड़े, बछेड़िया, खच्चर, गधे, सुअर, मेढे़ मेढ़िया, भेडें, मेमने, बकरियां और बकरियों के मेमने हैं;

(2) “वन अधिकारी” से ऐसा कोई व्यक्ति अभिप्रेत है जिसे 1॥। राज्य सरकार या 1॥। राज्य सरकार द्वारा इस निमित्त सशक्त कोई अधिकारी इस अधिनियम के सब या किसी प्रयोजन को पूरा करने के लिए अथवा इस अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए किसी नियम के अधीन वन अधिकारी द्वारा की जाने के लिए अपेक्षित कोई बात करने के लिए नियुक्त करे;

(3) “वन अपराध” से इस अधिनियम या इसके अधीन बनाए गए किसी नियम के अधीन दण्डनीय कोई अपराध अभिप्रेत है;

(4) “वन-उपज” के अन्तर्गत-

(क) निम्नलिखित वस्तुएं आती है अर्थात्-इमारती लकड़ी, लकड़ी का कोयला, कुचुक, खैर, लकड़ी का तेल, राल, प्राकृतिक वारनिश, छाल, लाख महुआ के फूल, महुआ के बीज, 2[कुथ] और हरड़ भले ही वे वन में पाई या वन से लाई गई हों या नहीं; और

(ख) निम्नलिखित वस्तुएं, उस सूरत में आती हैं जिसमें कि वे वन में पाई जाती हैं या वन से लाई जाती हैं, अर्थात्- (i) वृक्ष और पत्ते, फूल और फल और वृक्षों के इसमें इसके पूर्व अवर्णित सब अन्य भाग और उपज, (ii) (घास, बेलें, नरकुल और काई सहित) वे पौधे जो वृक्ष नहीं हैं और ऐसे पौधों के सब भाग और उपज, (iii) वन्य पशु और खालें, हाथी दांत, सींग, हड्डियां, रेशम, रेशम के कोए, शहद और मोम तथा पशुओं के सब अन्य भाग या उत्पाद, (iv) पीट, सतही मिट्टी, चट्टान और (चूना पत्थर, लेटराइट, खनिज तेल और खानों और खदानों की सब पैदावार सहित) खनिज;

(4क) “स्वामी” के अन्तर्गत, ऐसी सम्पत्ति के बारे में, प्रतिपाल्य अधिकरण आता है जो ऐसे अधिकरण के अधीक्षण या भार-साधन में है;

(5) “नदी” के अन्तर्गत कोई सरिता, नहर, सकरी खाड़ी या अन्य प्राकृतिक या कृत्रिम जल सरणी है;

(6) “इमारती लकड़ी” के अन्तर्गत वृक्ष आते हैं जब कि वे गिर गए हों या गिराए गए हों, और सब प्रकार की लकड़ी है चाहे वह किसी प्रयोजन के लिए काटी, गढ़ी या खोखली की गई हों या नहीं; और

(7) “वृक्ष” के अन्तर्गत ताड़, बांस, ठूंठ, झाड़-झांखड़ और बेंत आते हैं ।

धारा 3 - वनों को आरक्षित करने की शक्ति-
राज्य सरकार ऐसी किसी वन भूमि या बंजर-भूमि को, जो सरकार की सम्पत्ति है या जिस पर सरकार के साम्पत्तिक अधिकार हैं, या जिसकी पूरी वन-उपज या उस उपज के किसी भाग की, सरकार हकदार है, इसमें इसके पश्चात् उपबन्धित रीति से आरक्षित वन बना सकेगी ।
धारा 4 - राज्य सरकार द्वारा अधिसूचना

(1) जब कभी किसी भूमि को आरक्षित वन बनाने का विनिश्चय कर लिया गया हो, तब राज्य सरकार- (क) यह घोषणा करने वाली कि यह विनिश्चित किया गया है कि ऐसी भूमि को आरक्षित वन बनाया जाए, (ख) ऐसी भूमि की स्थिति, और सीमाओं को यथासंभव विनिर्दिष्ट करने वाली, तथा (ग) ऐसी सीमाओं के अन्दर समाविष्ट किसी भूमि में या उस भूमि पर या किसी वन-उपज में या उस उपज पर उन किन्हीं अधिकारों की, जिनकी बाबत यह अभिकथित है कि वे किसी व्यक्ति के पक्ष में विद्यमान हैं, विद्यमानता, स्वरूप और विस्तार की जांच और अवधारण करने के लिए और उसके सम्बन्ध में ऐसी कार्यवाही करने के लिए, जैसी इस अध्याय में उपबन्धित है, अधिकारी (जिसे इसमें इसके पश्चात् वन व्यवस्थापन अधिकारी कहा गया है) नियुक्त करने वाली, अधिसूचना राजपत्र में निकालेगी ।

स्पष्टीकरण-खण्ड (ख) के प्रयोजनों के लिए यह पर्याप्त होगा कि वन की सीमाएं, पथों, नदियों, टीलों या अन्य सुविदित या सहज समझी जाने वाली सीमाओं द्वारा वर्णित कर दी जाएं ।

(2) उपधारा (1) के खण्ड (ग) के अधीन नियुक्त अधिकारी मामूली तौर पर ऐसा व्यक्ति होगा, जिसने वन व्यवस्थापन अधिकारी के पद के सिवाय कोई वन पद धारण नहीं कर रखा है ।

(3) इस धारा की कोई बात राज्य सरकार को इस अधिनियम के अधीन वन व्यवस्थापन अधिकारी के कर्तव्यों का पालन करने के लिए तीन से अनधिक किसी संख्या में अधिकारियों को, जिनमें से एक से अनधिक ऐसा व्यक्ति होगा, जो पूर्वोक्त रूप में के सिवाय कोई वन पद धारण करता है, नियुक्त करने से निवारित नहीं करेगी ।

धारा 5 - वन अधिकारों के प्रोद्भूत होने का वर्जन
धारा 4 के अधीन अधिसूचना निकाले जाने के पश्चात् ऐसी अधिसूचना में समाविष्ट भूमि में या उस भूमि पर कोई अधिकार, उत्तराधिकार के जरिए या सरकार द्वारा या ऐसे व्यक्ति द्वारा या उनकी ओर से, जिसमें ऐसा अधिकार निहित था, जबकि अधिसूचना निकाली गई थी, लिखित रूप में दिए गए अनुदान या की गई संविदा के अधीन अर्जित होने के सिवाय अर्जित न होगा और खेती या किसी अन्य प्रयोजन के लिए ऐसी भूमि में नई कटाई-सफाई ऐसे नियमों के अनुसार किए जाने के सिवाय न की जाएगी जैसे राज्य सरकार द्वारा इस निमित्त बनाए जाएं ।
धारा 6 - वन व्यवस्थापन अधिकारी द्वारा उद्घोषणा
जबकि धारा 4 के अधीन अधिसूचना निकाली जा चुकी है, तब वन व्यवस्थापन अधिकारी, –

(क) प्रस्थापित वन की स्थिति और सीमाओं को यथासंभव विनिर्दिष्ट करने वाली,

(ख) उन परिणामों की, जो ऐसे वन के आरक्षण पर इसमें इसके पश्चात् यथा उपबन्धित रूप में सुनिश्चित होंगे, व्याख्या करने वाली, और

(ग) ऐसी उद्घोषणा की तारीख से तीन मास से अन्यून कालावधि नियत करने वाली और धारा 4 या 5 में वर्णित किसी अधिकार का दावा करने वाले हर व्यक्ति से यह अपेक्षा करने वाली कि वह वन व्यवस्थापन अधिकारी के समक्ष, ऐसे अधिकार के स्वरूप को और उसके सम्बन्ध में दावाकृत प्रतिकर के (यदि कोई हो) परिमाण और विशिष्टियों को विनिर्दिष्ट करने वाली लिखित सूचना ऐसी कालावधि के अन्दर उपस्थित करे, या उपस्थित होकर कथन करे,

उद्घोषणा उस भूमि के, जो उस उद्घोषणा में समाविष्ट हैं, पड़ोस के हर नगर और ग्राम में स्थानीय जनभाषा में प्रकाशित करेगा ।

धारा 7 - वन व्यवस्थापन अधिकारी द्वारा जांच
वन व्यवस्थापन अधिकारी धारा 6 के अधीन दिए गए सब कथनों को लिखेगा तथा उस धारा के अधीन सम्यक् रूप से किए गए सब दावों की और उन अधिकारों के अस्तित्व की, जो धारा 4 या धारा 5 में वर्णित है, और जिनके लिए दावा धारा 6 के अधीन नहीं किया गया है, जांच किसी सुविधाजनक स्थान पर वहां तक करेगा, जहां तक कि वे सरकार के अभिलेखों और ऐसे किन्हीं व्यक्तियों के, जिनकी बाबत यह संभाव्यता है कि वे उनसे परिचित होंगे, साक्ष्य से  अभिनिश्चेय हैं ।
धारा 8 - वन व्यवस्थापन अधिकारी की शक्तियां
ऐसी जांच के प्रयोजन के लिए वन व्यवस्थापन अधिकारी निम्नलिखित शक्तियां प्रयुक्त कर सकेगा, अर्थात्ः-

(क) किसी भूमि पर स्वयं या इस प्रयोजन के लिए अपने द्वारा प्राधिकृत किसी अधिकारी द्वारा प्रवेश करने और उसका सर्वेक्षण करने, उसे अभ्यंकित करने और उसका नक्शा बनाने की शक्ति,

(ख) वादों के विचारण में सिविल न्यायालय की शक्तियां ।

धारा 9 - अधिकारों का निर्वापन
वे अधिकार, जिनका दावा धारा 6 के अधीन नहीं किया गया है, और जिनके अस्तित्व की कोई जानकारी धारा 7 के अधीन की गई जांच द्वारा नहीं मिली है, जब तक कि उन अधिकारों का दावा करने वाले व्यक्ति, वन व्यवस्थापन अधिकारी का यह समाधान कि धारा 6 के अधीन नियत कालावधि के अन्दर ऐसा दावा न करने के लिए उसके पास पर्याप्त कारण था, धारा 20 के अधीन अधिसूचना के प्रकाशित होने से पूर्व नहीं कर देता, निर्वापित हो जाएंगे ।
धारा 10 - स्थानान्तरी खेती की पद्धति सम्बन्धी दावों से बरतना

(1) वन व्यस्थापन अधिकारी स्थानान्तरी खेती की पद्धति से संबंधित दावे की अवस्था में, दावे की और किसी स्थानीय नियम या आदेश की, जिसके अधीन वह पद्धति अनुज्ञात या विनियमित होती है, विशिष्टियों को देने वाला कथन अभिलिखित करेगा, और वह कथन अपनी इस राय के साथ कि क्या पद्धति पूर्णतः या भागतः अनुज्ञात या प्रतिषिद्ध होनी चाहिए, राज्य सरकार को भेजेगा ।

(2) राज्य सरकार उस कथन और राय के प्राप्त होने पर उस पद्धति को पूर्णतः या भागतः अनुज्ञात या निषिद्ध करने वाला आदेश दे सकेगी ।

(3) यदि ऐसी पद्धति पूर्णतः या भागतः अनुज्ञात की जाती है, तो वन व्यवस्थापन अधिकारी, –

(क) बन्दोबस्त वाली भूमि की सीमाओं को इस प्रकार बदल कर कि पर्याप्त विस्तार वाली, यथोचित प्रकार की और युक्तियुक्त रूप से सुविधाजनक स्थान में की भूमि दावेदारों के प्रयोजनों के लिए अपवर्जित हो जाए, या

(ख) बन्दोबस्त वाली भूमि के कतिपय प्रभागों को पृथक्तः अभ्यंकित करा कर और उसमें ऐसी शर्तों के अधीन, जो वह विहित करे, स्थानान्तरी खेती की पद्धति के लिए अनुज्ञा दावेदारों को देकर, उसके प्रयोग का प्रबन्ध कर सकेगा ।

(4) उपधारा (3) के अधीन किए गए सब इंतजाम राज्य सरकार की पूर्व मंजूरी के अधीन होंगे ।

(5) सभी मामलों में स्थानान्तरी खेती की पद्धति के बारे में यह समझा जाएगा कि यह ऐसा विशेषाधिकार है जिसे राज्य सरकार नियंत्रित, निर्बन्धित और उत्सादित कर सकती है ।

धारा 11 - ऐसी भूमि को अर्जित करने की शक्ति जिस पर अधिकार का दावा किया गया है

(1) वन व्यवस्थापन अधिकारी किसी भूमि में या पर ऐसे किसी अधिकार विषयक किए गए दावे की दशा में, जो मार्ग अधिकार या चरागाह अधिकार या वन-उपज या जलमार्ग के अधिकार से भिन्न है, उसे पूर्णतः या भागतः मंजूर या खारिज करने वाला आदेश देगा ।

(2) यदि ऐसा दावा पूर्णतः या भागतः मंजूर किया जाता है, तो वह व्यवस्थापन अधिकारी या तो-

(i) ऐसी भूमि को प्रस्थापित वन की सीमाओं से अपवर्जित करेगा; या

(ii) ऐसे अधिकारों के अभ्यर्पण के लिए उसके स्वामी से करार करेगा; या

(iii) भूमि अर्जन अधिनियम, 1894 (1894 का 1) द्वारा उपबन्धित रीति से ऐसी भूमि को अर्जित करने के लिए कार्यवाही करेगा ।

(3) ऐसी भूमि को इस प्रकार अर्जित करने के प्रयोजन के लिए-

(क) वन व्यवस्थापन अधिकारी की बाबत यह समझा जाएगा कि वह भूमि अर्जन अधिनियम, 1894 (1894 का 1) के अधीन कार्यवाही करने वाला कलक्टर है;

(ख) दावेदार के बारे में यह समझा जाएगा कि वह हितबद्ध और उस अधिनियम की धारा 9 के अधीन दी गई सूचना के अनुसार उसके समक्ष हाजिर होने वाला व्यक्ति है;

(ग) उस अधनियम की पूर्ववर्ती धाराओं के उपबन्धों के बारे में यह समझा जाएगा कि उनका अनुपालन हो चुका है; और

(घ) कलक्टर, दावेदार की सम्मति से या न्यायालय, दोनों पक्षकारों की सम्मति से, भूमि के रूप में या भागतः भूमि के रूप में और भागतः धन के रूप में प्रतिकर अधिनिर्णीत कर सकेगा ।

धारा 12 - चरागाह या वन-उपज पर के अधिकारों के दावों पर आदेश
चरागाह या वन-उपज पर के अधिकारों से सम्बद्ध दावे की दशा में वन व्यवस्थापन अधिकारी उन्हें पूर्णतः या भागतः मंजूर या खारिज करने वाला आदेश पारित करेगा ।
धारा 13 - वन व्यवस्थापन अधिकारी द्वारा तैयार किए जाने वाले अभिलेख
वन व्यवस्थापन अधिकारी धारा 12 के अधीन कोई आदेश पारित करते समय निम्नलिखित को यावत्साध्य अभिलिखित करेगा-

(क) अधिकार का दावा करने वाले व्यक्ति का नाम, उसके पिता का नाम, जाति, निवास और उपजीविका, और

(ख) उन सब खेतों या खेतों के समूहों (यदि कोई हों) का नाम, स्थिति और क्षेत्रफल और उन सब भवनों के (यदि कोई हों) नाम और स्थिति, जिनके विषय में ऐसे अधिकारों के प्रयोग का दावा किया गया है ।

धारा 14 - जहां वह दावा मंजूर करता है वहां अभिलेख
यदि वन व्यवस्थापन अधिकारी धारा 12 के अधीन किसी दावे को पूर्णतः या भागतः मंजूर कर लेता है, तो वह उन ढोरों की संख्या और वर्णन, जिन्हें दावेदार समय-समय पर वन में चराने के लिए हकदार हैं, वह ऋतु जिसके दौरान ऐसा चराना अनुज्ञात है, उस इमारती लकड़ी और अन्य वन-उपज का परिमाण जिसे वह समय-समय पर लेने या प्राप्त करने के लिए प्राधिकृत है, और ऐसी अन्य विशिष्टियां, जैसी उस मामले में अपेक्षित हों, विनिर्दिष्ट करके यह भी अभिलिखित करेगा कि कहां तक वह दावा इस प्रकार मंजूर किया गया है । वह यह भी अभिलिखित करेगा कि दावाकृत अधिकारों के प्रयोग द्वारा अभिप्राप्त इमारती लकड़ी या अन्य वन-उपज बेची जा सकेगी या वस्तु-विनियमित की जा सकेगी या नहीं ।
धारा 15 - मंजूर किए गए अधिकारों का प्रयोग

(1) वन व्यवस्थापन अधिकारी, ऐसे अभिलेख तैयार करने के पश्चात् अपनी सर्वोत्तम योग्यता के अनुसार और जिस आरक्षित वन के सम्बन्ध में दावा किया गया है, उसको बनाए रखने का सम्यक् ध्यान करते हुए, ऐसे आदेश पारित करेगा, जिनसे इस प्रकार मंजूर किए गए अधिकारों का निरंतर प्रयोग सुनिश्चित हो जाएगा ।

(2) वन व्यवस्थापन अधिकारी इस प्रयोजन के लिए-

(क) पर्याप्त विस्तार वाले और युक्तियुक्त रूप से सुविधाजनक स्थान में के किसी अन्य वन खण्ड को ऐसे दावेदारों के प्रयोजन के लिए उपवर्णित कर सकेगा और उन्हें इस प्रकार मंजूर किए गए विस्तार तक (यथास्थिति) चरागाह या वन-उपज का अधिकार प्रदान करने वाला आदेश अभिलिखित कर सकेगा; या

(ख) प्रस्थापित वन की सीमाओं को इस प्रकार बदल सकेगा कि दावेदारों के प्रयोजनों के लिए पर्याप्त विस्तार की और युक्तियुक्त रूप से सुविधाजनक स्थान में की वन भूमि अपवर्जित हो जाए;

(ग) ऐसे दावेदारों को, यथास्थिति, चरागाह या वन-उपज के अधिकार ऐसे मंजूर किए गए विस्तार तक, ऐसी ऋतु में, प्रस्थापित वन के ऐसे प्रभागों के अन्दर और ऐसे नियमों के अधीन, जो राज्य सरकार द्वारा इस निमित्त बनाए जाएं, चालू रखने वाला आदेश अभिलिखित कर सकेगा ।

धारा 16 - अधिकारों का रूपांतरण
यदि वन व्यस्थापन अधिकारी आरक्षित वन को बनाए रखने का सम्यक् ध्यान रखकर धारा 15 के अधीन ऐसा व्यवस्थापन करना असंभव पाता है, जिससे इस प्रकार मंजूर किए गए विस्तार तक उक्त अधिकारों का निरंतर प्रयोग सुनिश्चित हो जाता है, तो वह ऐसे नियमों के अधीन रहते हुए, जिन्हें राज्य सरकार इस निमित्त बनाए, उसके बदले में ऐसे व्यक्तियों को धन राशि के संदाय द्वारा या भूमि के अनुदान द्वारा या किसी अन्य रीति से, जिसे वह ठीक समझता है, ऐसे अधिकारों का रूपान्तरण कर सकेगा ।
धारा 17 - धारा 11, धारा 12, धारा 15 या धारा 16 के अधीन पारित आदेश के विरुद्ध अपील
ऐसा कोई व्यक्ति, जिसने इस अधिनियम के अधीन दावा किया है या कोई वन अधिकारी या राज्य सरकार द्वारा इस निमित्त साधारण या विशेषतः सशक्त अन्य व्यक्ति ऐसे दावे पर धारा 11, धारा 12, धारा 15 या धारा 16 के अधीन वन व्यस्थापन अधिकारी द्वारा पारित आदेश की तारीख से तीन मास के अन्दर ऐसे आदेश की अपील राजस्व विभाग के कलक्टर से अनिम्न पंक्ति के ऐसे अधिकारी के समक्ष उपस्थित कर सकेगा जिसे राज्य सरकार ऐसे आदेश के विरुद्ध अपील की सुनवाई करने के लिए राजपत्र में अधिसूचना द्वारा नियुक्त करेः

परन्तु राज्य सरकार एक न्यायालय (जिसे इसमें इसके पश्चात् वन न्यायालय कहा गया है) स्थापित कर सकेगी जो राज्य सरकार द्वारा नियुक्त किए जाने वाले तीन व्यक्तियों से मिलकर गठित होगा, और जब इस प्रकार वन न्यायालय स्थापित हो जाए तब वैसी सब अपीलें उसके समक्ष उपस्थित की जाएंगी ।

धारा 18 - धारा 17 के अधीन अपील

(1) धारा 17 के अधीन हर अपील लिखित अर्जी द्वारा की जाएगी और वन व्यवस्थापन अधिकारी को दी जा सकेगी जो उसे सुनवाई के लिए सक्षम प्राधिकारी को अविलम्ब भेज देगा ।

(2) यदि अपील, धारा 17 के अधीन नियुक्त अधिकारी के समक्ष की जाए, तो भू राजस्व से सम्बद्ध मामलों में अपील की सुनवाई के लिए तत्समय विहित रीति से उसकी सुनवाई की जाएगी ।

(3) यदि अपील वन न्यायालय के समक्ष की जाए, तो न्यायालय अपील की सुनवाई के लिए कोई दिन और प्रस्थापित वन के आस-पास में ऐसा सुविधाजनक स्थान नियत करेगा और उसकी सूचना पक्षकारों को देगा और तदनुसार ऐसी अपील की सुनवाई करेगा ।

(4) अपील पर, यथास्थिति, ऐसे अधिकारी द्वारा या न्यायालय द्वारा या ऐसे न्यायालय के सदस्यों के बहुमत द्वारा पारित आदेश, केवल राज्य सरकार के पुनरीक्षण के अधीन रहते हुए अंतिम होगा ।

धारा 19 - प्लीडर
राज्य सरकार या कोई व्यक्ति, जिसने इस अधिनियम के अधीन दावा किया है, इस अधिनियम के अधीन जांच या अपील के दौरान वन व्यवस्थापन अधिकारी या अपील अधिकारी या न्यायालय के समक्ष हाजिर होने, अभिवचन करने और अपनी ओर से कार्य करने के लिए किसी व्यक्ति को नियुक्त कर सकेगा ।
धारा 20 - वन को आरक्षित वन घोषित करने की अधिसूचना

(1) जबकि निम्नलिखित घटनाएं घटित हो गई हों, अर्थात्ः-

(क) जबकि दावा करने के लिए धारा 6 के अधीन नियत कालावधि बीत गई हो और उस धारा या धारा 9 के अधीन सब दावों का, यदि कोई हों, वन व्यवस्थापन अधिकारी द्वारा निपटारा कर दिया गया हो;

(ख) यदि कोई ऐसे दावे किए गए हों, तो जब कि ऐसे दावों पर पारित आदेशों की अपील करने के लिए धारा 17 द्वारा परिसीमित कालावधि बीत गई हो, और यदि ऐसी कालावधि के अन्दर उपस्थित की गई सभी अपीलों का (यदि कोई हों) निपटारा अपील अधिकारी या न्यायालय ने कर दिया हो; और

(ग) जबकि प्रस्थापित वन में सम्मिलित की जाने वाली सब भूमियां (यदि कोई हों) जिन्हें धारा 11 के अन्तर्गत वन व्यवस्थापन अधिकारी ने भूमि अर्जन अधिनियम, 1894 (1894 का 1) के अधीन अर्जित करने के लिए चुना है, उस अधिनियम की धारा 16 के अधीन सरकार में निहित हो गई हों, तब राज्य सरकार परिनिर्मित सीमा चिह्नों के अनुसार या अन्यथा उस वन की, जिसे आरक्षित किया जाना है, सीमाओं को परिनिश्चित रूप से विनिर्दिष्ट करने वाली और अधिसूचना द्वारा नियत तारीख से उसे आरक्षित वन घोषित करने वाली अधिसूचना राजपत्र में प्रकाशित करेगी ।

(2) ऐसा वन इस प्रकार नियत तारीख से आरक्षित वन समझा जाएगा ।

धारा 21 - ऐसी अधिसूचना के अनुवाद का वन के आसपास में प्रकाशन
ऐसी अधिसूचना द्वारा नियत तारीख से पूर्व, वन अधिकारी स्थानीय जन भाषा में उसका अनुवाद वन के आसपास के हर नगर और ग्राम में प्रकाशित कराएगा ।
धारा 22 - धारा 15 या 18 के अधीन किए गए प्रबन्ध का पुनरीक्षण करने की शक्ति
राज्य सरकार धारा 15 या 18 के अधीन किए गए किसी प्रबन्ध का पुनरीक्षण धारा 20 के अधीन किसी अधिसूचना के प्रकाशन से पांच वर्ष के अन्दर कर सकेगी और धारा 15 या धारा 18 के अधीन किए गए किसी आदेश को इस प्रयोजन के लिए विखण्डित या उपांतरित कर सकेगी और निदेश दे सकेगी कि धारा 15 में विनिर्दिष्ट कार्यवाहियों में से कोई कार्यवाही ऐसी कार्यवाहियों में से किसी अन्य के बदले में की जाए या धारा 12 के अधीन मंजूर किए गए अधिकारों का धारा 16 के अधीन रूपान्तरण किया जाए ।
धारा 23 - आरक्षित वन में कोई अधिकार इसमें उपबंधित के अनुसार अर्जित होने के सिवाय अर्जित नहीं होगा
आरक्षित वन में या उस पर किसी प्रकार का कोई अधिकार, उत्तराधिकार द्वारा या सरकार द्वारा या उसकी ओर से या किसी व्यक्ति द्वारा, जिसमें ऐसा अधिकार उस समय निहित था, जिस समय धारा 20 के अधीन अधिसूचना निकाली गई थी, या उसकी ओर से दिए गए अनुदान या की गई लिखित संविदा के अधीन अर्जित किए जाने के सिवाय, अर्जित नहीं होगा ।
धारा 24 - मंजूरी के बिना अधिकारों का अन्य-संक्रामण न किया जाएगा

(1) धारा 23 में विनिर्दिष्ट किसी बात के होते हुए भी ऐसा कोई अधिकार, जो धारा 15 की उपधारा (2) के खण्ड (ग) के अधीन चालू रखा गया है, राज्य सरकार की मंजूरी के बिना अनुदान द्वारा, विक्रय द्वारा, पट्टे द्वारा, बन्धक द्वारा या अन्यथा अन्यसंक्रान्त न किया जाएगाः परन्तु जबकि ऐसा कोई अधिकार किसी भूमि या गृह से अनुलग्न है तब वह ऐसी भूमि या गृह के साथ बेचा जा सकेगा या अन्यथा अन्यसंक्रान्त किया जा सकेगा ।

(2) ऐसे किसी अधिकार के प्रयोग में अभिप्राप्त कोई इमारती लकड़ी या वन उपज, उस मात्रा तक के सिवाय, जो धारा 14 के अधीन अभिलिखित आदेश में मंजूर की गई हो, बेची या विनियमित न की जा सकेगी ।

धारा 25 - आरक्षित वनों में के पथों और जलमार्गों को बन्द करने की शक्ति
वन अधिकारी आरक्षित वन में के किसी लोक या प्राइवेट पथ या जलमार्ग को राज्य सरकार या इन निमित्त उसके सम्यक् रूप से प्राधिकृत किसी अधिकारी की पूर्व मंजूरी से बन्द कर सकेगा, परन्तु वह यह तभी कर सकेगा जबकि इस प्रकार बन्द किए गए पथ या जलमार्ग की बजाय ऐसा प्रतिस्थानी पथ या जलमार्ग, जिसको राज्य सरकार युक्तियुक्त रूप से सुविधाजनक समझती है, पहले से ही विद्यमान है, या वन अधिकारी द्वारा उसके बदले में उपबंधित या सन्निर्मित किया गया है ।
धारा 26 - ऐसे वनों में प्रतिषिद्ध कार्य

(1) जो कोई व्यक्ति-

(क) धारा 5 के अधीन प्रतिषिद्ध नई कटाई-सफाई करेगा; या

(ख) आरक्षित वन में आग लगाएगा, या इस निमित्त राज्य सरकार द्वारा बनाए गए किन्हीं नियमों का उल्लंघन करते हुए ऐसी रीति से आग जलाएगा या आग को जलते छोड़ देगा जिससे ऐसा वन संकटापन्न हो जाए; या जो आरक्षित वन में, –

(ग) ऐसी ऋतुओं में के सिवाय, जिन्हें वन अधिकारी इस निमित्त अधिसूचित करे, कोई आग जलाएगा, रखेगा या     ले जाएगा;

(घ) अतिचार करेगा या पशु चराएगा या पशुओं को अतिचार करने देगा;

(ङ) किसी वृक्ष को गिराने या किसी इमारती लकड़ी को काटने या घसीटने में उपेक्षा द्वारा कोई नुकसान पहुंचाएगा;

(च) किसी वृक्ष को गिराएगा, परितक्षण करेगा, छांटेगा, छेवेगा, या उसे जलाएगा या उसकी छाल उतार डालेगा, या पत्तियां तोड़ डालेगा, या उसे अन्यथा नुकसान पहुंचाएगा;

(छ) पत्थर की खुदाई करेगा, चूना या लकड़ी का कोयला फूंकेगा, या किसी वन उपज का संग्रह करेगा, उससे कोई विनिर्माण प्रक्रिया करेगा, या उसे हटाएगा;

(ज) खेती या किसी अन्य प्रयोजन के लिए किसी भूमि को साफ करेगा या तोड़ेगा;

(झ) राज्य सरकार द्वारा इस निमित्त बनाए गए किन्हीं नियमों के उल्लंघन में शिकार खेलेगा, गोली चलाएगा, मछली पकड़ेगा, जल विषैला करेगा या पाश या जाल बिछाएगा; या

(ञ) किसी ऐसे क्षेत्र में, जिसमें हाथी परिरक्षण अधिनियम, 1879 (1879 का 6) प्रवृत्त नहीं है, इस प्रकार बनाए गए किन्हीं नियमों के उल्लंघन में हाथियों का वध करेगा या उन्हें पकड़ेगा, वह वन को नुकसान पहुंचाने के कारण ऐसे प्रतिकर के अतिरिक्त, जिसका संदाय किया जाना सिद्धदोष करने वाला न्यायालय निदिष्ट करे, ऐसी अवधि के कारावास से, जो छह मास तक का हो सकेगा या जुर्माने से, जो पांच सौ रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दण्डित किया जाएगा ।

(2) इस धारा की किसी बात की बाबत यह न समझा जाएगा कि वह-

(क) वन अधिकारी की लिखित अनुज्ञा या राज्य सरकार द्वारा बनाए गए किसी नियम के अधीन किए गए किसी कार्य को, या

(ख) धारा 15 की उपधारा (2) के खण्ड (ग) के अधीन चालू रखे गए या सरकार द्वारा या उसकी ओर से धारा 23 के अधीन दिए गए लिखित अनुदान या की गई लिखित संविदा द्वारा सृष्ट किसी अधिकार, के प्रयोग को, प्रतिषिद्ध करती है ।

(3) जब कभी आरक्षित वन में जानबूझकर या घोर उपेक्षा द्वारा आग लगाई जाती है तब (इस बात के होते हुए भी कि इस धारा के अधीन कोई शास्ति लगाई गई है) राज्य सरकार निदेश दे सकेगी कि ऐसे वन या उसके किसी प्रभाग में चरागाह या वन उपज के सब अधिकारों का प्रयोग उतनी कालावधि के लिए, जितनी वह ठीक समझती है, निलम्बित रहेगा ।

धारा 27 - यह घोषित करने की शक्ति कि वन आरक्षित वन नहीं रहा है

(1) राज्य सरकार  राजपत्र में अधिसूचना द्वारा निदेश दे सकेगी कि इस अधिनियम के अधीन आरक्षित कोई वन या उसका प्रभाग, ऐसी अधिसूचना द्वारा नियत तारीख से, आरक्षित वन नहीं रह जाएगा ।

(2) इस प्रकार नियत तारीख से, ऐसा वन या उसका प्रभाग आरक्षित नहीं रह जाएगा, किन्तु उसमें वे अधिकार (यदि कोई हों), जो निर्वापित हो गए हैं, ऐसे न रहने के परिणामस्वरूप पुनरुज्जीवित नहीं हो जाएंगे ।

धारा 28 - ग्राम वनों का निर्माण

(1) राज्य सरकार किसी ऐसी भूमि के प्रति या उस पर, जो आरक्षित वन कर दी गई है, अधिकार किसी ग्राम समुदाय को समनुदिष्ट कर सकेगी और ऐसा समनुदेशन रद्द कर सकेगी । इस प्रकार समनुदेशित सब वन ग्राम वन कहलाएंगे ।

(2) जिस ग्राम समुदाय को ऐसा समनुदेशन किया गया है उस ग्राम समुदाय के लिए इमारती लकड़ी या अन्य वन-उपज या चरागाह का उपबन्ध जिन शर्तों के अधीन किया जा सकेगा उन्हें ऐसे वन के संरक्षण और सुधार के लिए उनके कर्तव्यों को विहित करने वाले नियम राज्य सरकार ग्राम वनों के प्रबन्ध को विनियमित करने के लिए बना सकेगी ।

(3) इस अधिनियम के वे सब उपबन्ध, जो आरक्षित वनों से संबद्ध हैं, वहां तक (जहां तक कि वे इस प्रकार बनाए गए सब नियमों से असंगत नहीं हैं), ग्राम वनों को लागू होंगे ।

धारा 29 - संरक्षित वन

(1) राज्य सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा घोषित कर सकेगी कि इस अध्याय के उपबन्ध किसी वन भूमि या बंजर भूमि को, जो आरक्षित वन में सम्मिलित नहीं है किन्तु जो सरकार की संपत्ति है या जिस पर सरकार का साम्पत्तिक अधिकार है या जिसकी संपूर्ण वनउपज या उसके किसी भाग को, जिसकी सरकार हकदार है, लागू है ।

(2) ऐसी किसी अधिसूचना में समाविष्ट वन भूमि और बंजर भूमि संरक्षित वन कहलाएगी ।

(3) जब तक कि अधिसूचना में समाविष्ट वन भूमि या बंजर भूमि में या उन पर सरकार या प्राइवेट व्यक्तियों के अधिकारों के स्वरूप और विस्तार की जांच नहीं कर ली जाती और सर्वेक्षण या बन्दोबस्त अभिलेख में या अन्य किसी ऐसी रीति से, जैसी राज्य सरकार पर्याप्त समझती है, उन्हें अभिलिखित नहीं कर लिया जाता है, तब ऐसी अधिसूचना नहीं निकाली जाएगी ।

जब तक कि प्रतिकूल साबित न कर दिया जाए, ऐसे हर अभिलेख के बारे में यह उपधारणा की जाएगी कि वह शुद्ध हैः परन्तु यदि किसी वन भूमि या बंजर भूमि की बाबत राज्य सरकार यह समझती है कि ऐसी जांच और अभिलेख आवश्यक है, किन्तु उनमें इतना समय लगेगा कि इस बीच राज्य सरकार के अधिकार खतरे में पड़ जाएंगे, तो राज्य सरकार ऐसी जांच और अभिलेख के लम्बित रहने तक ऐसी भूमि को संरक्षित वन घोषित कर सकेगी, किन्तु इससे किन्हीं व्यक्तियों या समुदायों के विद्यमान अधिकार कम या प्रभावित नहीं होंगे ।

धारा 30 - वृक्ष आदि को आरक्षित करने की अधिसूचना निकालने की शक्ति

राज्य सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा-

(क) संरक्षित वन में के किन्हीं वृक्षों या वृक्षों के वर्ग को अधिसूचना द्वारा नियत तारीख से आरक्षित घोषित कर सकेगी;

(ख) यह घोषित कर सकेगी कि अधिसूचना में विनिर्दिष्ट ऐसे वन का प्रभाग तीस वर्ष से अनधिक ऐसी कालावधि के लिए, जैसी राज्य सरकार उचित समझे, बन्द रहेगा और ऐसे प्रभाग पर प्राइवेट व्यक्तियों के अधिकार, यदि कोई हों, ऐसी अवधि के दौरान निलम्बित रहेंगे, परन्तु यह तभी होगा जब कि ऐसे वन का शेष भाग इस प्रकार बन्द किए गए प्रभाग में निलम्बित अधिकारों के सम्यक् प्रयोग के लिए पर्याप्त और युक्तियुक्त रूप से सुविधाजनक स्थान में हों; या

(ग) ऐसे किसी वन में पत्थर की खुदाई करने या चूने या लकड़ी के कोयले को फूंकने, या ऐसे किसी वन में वन-उपज का संग्रहण करने या उस पर कोई विनिर्माण प्रक्रिया करने या उसे हटाने और खेती, भवन निर्माण, पशुओं के गोल रखने या किसी अन्य प्रयोजन के लिए किसी ऐसे वन में कोई भूमि तोड़ना या साफ करना, यथापूर्वोक्त नियत तारीख से प्रतिषिद्ध कर सकेगी ।

धारा 31 - ऐसी अधिसूचना के अनुवाद का आसपास में प्रकाशन
कलक्टर धारा 30 के अधीन निकाली गई हर अधिसूचना का स्थानीय जनभाषा में अनुवाद अधिसूचना में समाविष्ट वन के आसपास वाले हर नगर और ग्राम में सहजदृश्य स्थान पर लगवाएगा ।
धारा 32 - संरक्षित वनों के बारे में नियम बनाने की शक्ति

राज्य सरकार निम्नलिखित बातों के विनियमन के लिए नियम बना सकेगी, अर्थात्ः-

(क) वृक्षों और इमारती लकड़ी की कटाई, चिराई, संपरिवर्तित करना और हटाना, तथा संरक्षित वनों की वन-उपज का संग्रहण करना, विनिर्माण करना तथा उसका हटाना,

(ख) संरक्षित वनों के सामीप्य के नगरों और ग्रामों के निवासियों को अपने प्रयोग के लिए वृक्ष, इमारती लकड़ी या अन्य वन-उपज लेने के हेतु अनुज्ञप्तियां अनुदत्त करना और ऐसे व्यक्तियों द्वारा ऐसी अनुज्ञप्तियों का पेश और वापस किया जाना,

(ग) व्यापार के प्रयोजनों के लिए ऐसे वनों में से वृक्षों या इमारती लकड़ी या वन-उपज को गिराने या हटाने वाले व्यक्तियों को अनुज्ञप्तियां प्रदान करना और ऐसे व्यक्तियों द्वारा ऐसी अनुज्ञप्तियां पेश और वापस किया जाना,

(घ) खण्ड (ख) और (ग) में वर्णित व्यक्तियों द्वारा ऐसे वृक्षों को काटने या ऐसी इमारती लकड़ी या वन-उपज को संगृहीत करने और हटाने की अनुज्ञा के लिए किए जाने वाले संदाय, यदि कोई हों,

(ङ) ऐसे वृक्षों, इमारती लकड़ी और उपज के बारे में उनके द्वारा किए जाने वाले अन्य संदाय, यदि कोई हों और वे स्थान जहां ऐसा संदाय किया जाएगा,

(च) ऐसे वनों में से होकर जाने वाली वन-उपज की परीक्षा,

(छ) ऐसे वनों में खेती या अन्य प्रयोजनों के लिए भूमि की कटाई-सफाई और भूमि तोड़ना,

(ज) ऐसे वनों में पड़ी इमारती लकड़ी और धारा 30 के अधीन आरक्षित वृक्षों का आग से संरक्षण,

(झ) ऐसे वनों में घास काटना और ढोर चराना,

(ञ) ऐसे वनों में शिकार खेलना, गोली चलाना, मछली पकड़ना, जल विषैला करना और पाश या जाल बिछाना और ऐसे वनों के उन क्षेत्रों में जिनमें हाथी परिरक्षण अधिनियम, 1879 (1879 का 6) प्रवृत्त नहीं है, हाथियों का वध करना या पकड़ना,

(ट) धारा 30 के अधीन वन के किसी बंद प्रभाग का संरक्षण और प्रबन्ध, और

(ठ) धारा 29 में निर्देशित अधिकारों का प्रयोग ।

धारा 33 - धारा 30 के अधीन अधिसूचना या धारा 32 के अधीन वाले नियमों के उल्लंघन में किए गए कार्यों के लिए शास्तियां

(1) जो कोई व्यक्ति निम्नलिखित अपराधों में से कोई अपराध करेगा, अर्थात्ः-

(क) धारा 30 के अधीन आरक्षित किसी वृक्ष को गिराएगा, परितक्षण करेगा, छोंटेगा, छेवेगा या जलाएगा या ऐसे किसी वृक्ष की छाल उतार डालेगा या पत्तियां तोड़ डालेगा या उसे अन्यथा नुकसान पहुंचाएगा,

(ख) धारा 30 के अधीन वाले किसी प्रतिषेध के प्रतिकूल पत्थर की खुदाई करेगा या चूने या लकड़ी का कोयला फूंकेगा, या किसी वन-उपज का संग्रहण करेगा, उससे कोई विनिर्माण प्रक्रिया चलाएगा, या उसे हटाएगा,

(ग) किसी संरक्षित वन में, धारा 30 के अधीन वाले किसी प्रतिषेष के प्रतिकूल, किसी भूमि को खेती या किसी अन्य प्रयोजन के लिए तोड़ेगा या साफ करेगा,

(घ) ऐसे वन को आग लगाएगा, या धारा 30 के अधीन आरक्षित किसी वृक्ष तक, चाहे वह खड़ा हो, गिर गया हो, या गिराया गया हो, या ऐसे वन के बन्द किए गए किसी प्रभाग तक फैल जाने से रोकने के लिए युक्तियुक्त-पूर्ण पूर्वावधानी बरते बिना आग जताएगा,

(ङ) ऐसे किसी वृक्ष या बन्द प्रभाग के सामीप्य में अपने द्वारा जलाई गई किसी आग को जलता छोड़ देगा,

(च) किसी वृक्ष को इस प्रकार गिराएगा या किसी इमारती लकड़ी को इस प्रकार खींचेगा कि यथापूर्वोक्त रूप में आरक्षित किसी वृक्ष को नुकसान पहुंचाता है,

(छ) पशुओं को ऐसे किसी वृक्ष को नुकसान पहुंचाने देगा,

(ज) धारा 32 के अधीन बनाए गए किन्हीं नियमों का अतिलंघन करेगा, वह उस अवधि के लिए कारावास से, जो छह मास तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, जो पांच सौ रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दण्डनीय होगा । (2) जब कभी संरक्षित वन में जानबूझकर या घोर उपेक्षा द्वारा आग लगाई जाती है, तब राज्य सरकार, इस बात के होते हुए भी कि इस धारा के अधीन कोई शास्ति लगाई गई है, निदेश दे सकेगी कि ऐसे वन में या उसके किसी प्रभाग में चरागाह या वन उपज के किसी अधिकार का प्रयोग उतनी अवधि के लिए, जितनी वह ठीक समझती है, निलम्बित रहेगा ।

धारा 34 - इस अध्याय की कोई बात कतिपय मामलों में किए गए कार्यों का प्रतिषेध नहीं करेगी
इस अध्याय की किसी बात की बाबत यह नहीं समझा जाएगा कि वह ऐसे किसी कार्य का प्रतिषेध करती है जो वन अधिकारी की लिखित अनुज्ञा से या धारा 32 के अधीन बनाए गए नियमों के अनुसार किया गया है, या जो धारा 29 के अधीन अभिलिखित किसी अधिकार के प्रयोग में धारा 30 के अधीन बन्द किए गए किसी वन के प्रभाग के विषय में, या किन्हीं उन अधिकारों के विषय में जिनका प्रयोग धारा 33 के अधीन निलम्बित किया गया है, किए जाने के अलावा किया गया है ।
धारा 35 - विशेष प्रयोजनों के लिए वनों का संरक्षण

(1) राज्य सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा किसी वन या बंजर भूमि में-

(क) खेती के लिए भूमि तोड़ना या साफ करना,

(ख) ढोर चराना, या

(ग) वनस्पति को जलाना या उसे साफ करना, उस सूरत में विनियमित या प्रतिषिद्ध कर सकेगी जिसमें कि ऐसा विनियमन या प्रतिषेध निम्नलिखित प्रयोजनों में से किसी के लिए आवश्यक प्रतीत होता है, अर्थात्ः-

(i) आंधी, तेज वायु, लुढ़कते पत्थरों, बाढ़ और हिमानी से संरक्षण,

(ii) पहाड़ी भू-भागों की शिखरों और ढलानों और घाटियों पर मृदा का परिरक्षण, भूमि-स्खलन या खादर और वेगधारा के बनने को रोकना, या कटाव या उस पर बालू, पत्थर या बजरी के जमाव से भूमि का संरक्षण, (iii) झरनों, नदियों और तलाबों में जलपूर्ति बनाए रखना,

(iv) पथों, पुलों, रेलों और संचार के अन्य मार्गों का संरक्षण,

(v) लोक स्वास्थ्य का परिरक्षण ।

(2) राज्य सरकार ऐसे किसी प्रयोजन के लिए ऐसे संकर्म, जैसे वह ठीक समझती है, किसी वन या बंजर भूमि में अपने व्यय पर बनवा सकेगी ।

(3) जब तक कि ऐसे वन या भूमि के स्वामी को इस बात के लिए समाहूत करने वाली सूचना न दे दी गई हो कि तुम ऐसी सूचना में विनिर्दिष्ट युक्तियुक्त कालावधि के अन्दर यह हेतुक दर्शित करो कि, यथास्थिति, ऐसी अधिसूचना क्यों न निकाली जाए या संकर्म क्यों न बनाया जाए, और जब तक कि उसके आक्षेपों की, यदि कोई हों, और किसी साक्ष्य की जो वह उनके समर्थन में पेश करे, सुनवाई उस अधिकारी द्वारा न की जा चुकी हो जो उस निमित्त सम्यक् रूप से नियुक्त किया गया है और राज्य सरकार उन पर विचार न कर चुकी हो, तब तक उपधारा (1) के अधीन कोई अधिसूचना नहीं निकाली जाएगी और न उपधारा (2) के अधीन कोई संकर्म आरंभ किया जाएगा ।

धारा 36 - वनों का प्रबन्ध संभालने की शक्ति

(1) धारा 35 के अधीन किसी विनियम या प्रतिषेध की उपेक्षा या जानबूझकर अवज्ञा की दशा में या, यदि उस धारा के अधीन होने वाले किसी संकर्म के प्रयोजनार्थ ऐसा अपेक्षित है, तो राज्य सरकार ऐसे वन या भूमि के स्वामी को लिखित सूचना के पश्चात् और उसके आक्षेपों पर, यदि कोई हों, विचार करने के पश्चात् उसे वन अधिकारी के नियंत्रण के अधीन कर सकेगी और घोषित कर सकेगी कि आरक्षित वनों से सम्बद्ध इस अधिनियम के सब उपबन्ध या इनमें से कोई उपबन्ध ऐसे वन या भूमि को लागू होंगे ।

(2) ऐसे वन या भूमि के प्रबन्ध से उत्पन्न होने वाले शुद्ध लाभ, यदि कोई हों, उक्त स्वामी को दे दिए जाएंगे ।

धारा 37 - कुछ अवस्थाओं में वनों का स्वत्वहरण

(1) इस अध्याय के अधीन ऐसे किसी मामले में, जिसमें कि राज्य सरकार यह समझती है कि वन या भूमि को वन अधिकारी के नियंत्रण में रखने के बजाय इसे लोक प्रयोजन के लिए अर्जित कर लिया जाए, राज्य सरकार भूमि अर्जन अधिनियम, 1894 (1894 का 1) द्वारा उपबन्धित रीति से उसे अर्जित करने के लिए कार्यवाही कर सकेगी ।

(2) धारा 35 के अधीन किसी अधिसूचना में समाविष्ट वन या भूमि का स्वामी, उस अधिसूचना की तारीख से अन्यून तीन वर्ष या अनधिक बारह वर्ष के अन्दर किसी भी समय यह अपेक्षा कर सकेगा कि ऐसा वन या भूमि लोक प्रयोजन के लिए अर्जित किया जाए और राज्य सरकार ऐसे वन या भूमि को तदनुसार अर्जित कर लेगी ।

धारा 38 - स्वामियों की प्रार्थना पर वनों का संरक्षण

(1) किसी भूमि का स्वामी, या यदि उसके एक से अधिक स्वामी हैं, तो उन अंशों में से कुल मिलाकर कम से कम दो तिहाई अंशों के स्वामी इस दृष्टि से कि उस भूमि पर वनों का रोपण या संरक्षण किया जाए, कलक्टर को अपनी इस इच्छा का लिखित अभ्यावेदन कर सकेगा या कर सकेंगेः- (क) कि हमारी ओर से ऐसी भूमि का आरक्षित या संरक्षित वन के रूप में प्रबन्ध वन अधिकारी द्वारा ऐसे निबन्धनों पर किया जाए जो परस्पर कराए पाए जाएं, या

(ख) इस अधिनियम के सब उपबन्ध या उनमें से कोई उपबन्ध ऐसी भूमि को लागू कर दिए जाएं ।

(2) दोनों में से हर अवस्था में, राज्य सरकार, ऐसी भूमि को इस अधिनियम के ऐसे उपबन्ध राजपत्र में अधिसूचना द्वारा लागू कर सकेगी, जिन्हें वह ऐसी भूमि पर परिस्थितियों में उचित समझती हो और जो आवेदकों द्वारा वांछित हो ।

धारा 39 - इमारती लकड़ी और अन्य वन-उपज पर शुल्क अधिरोपित करने की शक्ति

(1)केन्द्रीय सरकार] ऐसी रीति से, ऐसे स्थानों में और ऐसी दरों पर, जैसी वह राजपत्र में अधिसूचना द्वारा घोषित करे, उस सब इमारती लकड़ी या वन-उपज पर शुल्क उद्गृहीत कर सकेगी-

(क)जोउन राज्यक्षेत्रों में, जिन पर इस अधिनियम का विस्तार है पैदा की जाती है और जिसके विषय में सरकार को कोई अधिकार प्राप्त है, या

(ख) जो उन राज्यक्षेत्रों के, जिन पर इस अधिनियम का विस्तार है, बाहर के किसी स्थान से लाया जाता है ।

(2) ऐसे हर मामले में, जिसमें ऐसे शुल्क की बाबत यह निर्दिष्ट किया गया है कि वह मूल्यानुसार उद्गृहीत किया जाए, 1[केन्द्रीय सरकार] वैसी ही अधिसूचना द्वारा, वह मूल्य नियत कर सकेगी जिस पर ऐसा शुल्क निर्धारित होगा ।

(3) इमारती लकड़ी या अन्य वनउपज पर जो शुल्क उस समय, जब वह अधिनियम किसी राज्यक्षेत्र में प्रवृत्त होता है, राज्य सरकार के प्राधिकार के अधीन उसमें उद्गृहीत होते हैं, उन सब की बाबत यह समझा जाएगा कि वे इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन उद्गृहीत होते हैं और सम्यक् रूप से उद्गृहीत होते रहे हैं ।

(4) जब तक कि 2[संसद्] द्वारा प्रतिकूल उपबन्ध नहीं किया जाता, राज्य सरकार इस धारा में किसी बात के होते हुए भी किसी शुल्क को लगातार उद्गृहीत कर सकेगी, जिसे वह 3[संविधान] के प्रारंभ के पूर्व इस धारा के उस समय प्रवृत्त रूप में विधिपूर्णतः उद्गृहीत करती थीः

परन्तु इस उपधारा की कोई बात ऐसे किसी शुल्क का उद्ग्रहण प्राधिकृत नहीं करती जो राज्य की इमारती लकड़ी या अन्य वन-उपज और राज्य के बाहर के स्थान की समरूप इमारती लकड़ी या अन्य वन-उपज के बीच पूर्वकथित के पक्ष में विभेद करता है, या जो राज्य के बाहर किसी स्थान की इमारती लकड़ी या अन्य वन-उपज के मामले में, किसी एक स्थान की इमारती लकड़ी या अन्य वन-उपज और अन्य स्थान की समरूप इमारती लकड़ी या वन-उपज के बीच विभेद करता है ।]

धारा 40 - सीमा सम्बन्धी उपबन्ध क्रय-धन या स्वामिस्व के सम्बन्ध में लागू नहीं होगा
इस अध्याय की किसी बात की बाबत यह न समझा जाएगा कि वह उस राशि को, यदि कोई हो, जो किसी इमारती लकड़ी या अन्य वन-उपज पर क्रयधन या स्वामिस्व के रूप में प्रभार्य है, सीमित करती है, भले ही वह ऐसी इमारती लकड़ी या उपज के अभिवहन के दौरान उस पर उस रीति से उद्गृहीत होता हो जिससे शुल्क उद्गृहीत होता है ।
धारा 41 - वन-उपज के अभिवहन को विनियमित करने के लिए नियम बनाने की शक्ति

(1) इमारती लकड़ी के बहाने के विषय में, सब नदियां और उनके तटों का नियंत्रण और थल या जल द्वारा अभिवहन में की इमारती लकड़ी और अन्य वन-उपज का नियंत्रण, राज्य सरकार में निहित है और वह सब इमारती लकड़ी और अन्य वन-उपज के अभिवहन को विनियमित करने के लिए नियम बना सकेगी ।

(2) विशेषतः और पूर्ववर्ती शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना ऐसे नियम-

(क) उन मार्गों को विहित कर सकेंगे जिन द्वारा ही इमारती लकड़ी या अन्य वन-उपज, राज्य में आयात या राज्य से निर्यात या राज्य के अन्दर स्थानान्तरित की जा सकेगी,

(ख) किसी ऐसे अधिकारी के पास के बिना, जो उसे देने के लिए सम्यक् रूप से प्राधिकृत है, या ऐसे पास की शर्तों के अनुसार से अन्यथा ऐसी इमारती लकड़ी या अन्य उपज के आयात या निर्यात या स्थानान्तरण को प्रतिषिद्ध कर सकेंगे,

(ग) ऐसे पासों के दिए जाने, पेश करने और वापस करने के लिए और उनके लिए फीसों के दिए जाने के लिए उपबन्ध कर सकेंगे,

(घ) अभिवहन में की इमारती लकड़ी या अन्य वन-उपज को, जिसके विषय में यह विश्वास करने का कारण है कि उसकी कीमत के कारण या उस पर देय किसी शुल्क, फीस, या स्वामिस्व या प्रभार के कारण कोई धन सरकार को देय है या जिस पर इस अधिनियम के प्रयोजन के लिए चिह्न लगाना वांछनीय है, रोक लेने, उसके बारे में रिपोर्ट देने, उसे परीक्षित करने, या चिह्नित करने के लिए उपबन्ध कर सकेंगे,

(ङ) उन डिपुओं की स्थापना और विनियमन के लिए, जिनमें ऐसी इमारती लकड़ी या अन्य वन-उपज उन व्यक्तियों द्वारा जिनके भारसाधन में वह है, परीक्षा के लिए या ऐसे धन के दिए जाने के लिए, या इस हेतु कि ऐसे चिह्न उन पर लगाए जाएं, ले जाई जाएगी और उन शर्तों का जिनके अधीन ऐसी इमारती लकड़ी या अन्य वन-उपज ऐसे डिपुओं को लाई जाएगी, उनमें संगृहीत की जाएगी और उन से हटाई जाएंगी, उपबन्ध कर सकेंगे,

(च) इमारती लकड़ी और अन्य वनउपज के अभिवहन के लिए प्रयुक्त किसी नदी की धारा या तटों को बन्द करना या बाधित करना और ऐसी किसी नदीं में घास, झाड़ झंखाड, शाखाएं या पत्तियां फेंकना या ऐसा कोई अन्य कार्य करना जिससे ऐसी नदीं बन्द या बाधित हो जाए, प्रतिषिद्ध कर सकेंगे,

(छ) ऐसी किसी नदी की धारा या किनारों की किसी बाधा के निवारण या हटाने के लिए और उस व्यक्ति से, जिसके कार्यों और उपेक्षा के कारण यह आवश्यक हुआ है, ऐसे निवारण या हटाने का खर्चा वसूल करने के लिए उपबन्ध कर सकेंगे,

(ज) विनिर्दिष्ट स्थानीय सीमाओं के अन्दर, लकड़ी की चिराई के लिए गड्ढा बनाना, इमारती लकड़ी को संपरिवर्तित करना, काट लेना, जलाना, छिपाना या उस पर चिह्न लगाना, उस पर किन्हीं चिह्नों को बदलना या मिटाना या चिह्न लगाने वाले हथौडे या इमारती लकड़ी को चिह्नित करने के लिए प्रयुक्त अन्य उपकरणों को कब्जे में रखना या साथ ले जाना, पूर्ण रूप से या शर्तों के अधीन प्रतिषिद्ध कर सकेंगे,

(झ) इमारती लकड़ी के लिए सम्पत्ति संबंधी चिह्नों के प्रयोग और ऐसे चिह्नों के रजिस्ट्रीकरण को विनियमित कर सकेंगे, उस समय को विहित कर सकेंगे, जिसके लिए ऐसा रजिस्ट्रीकरण प्रभावी रहेगा, ऐसे चिह्नों की उस संख्या को सीमित कर सकेंगे जो किसी व्यक्ति द्वारा रजिस्ट्रीकृत किए जा सकेंगे, और ऐसे रजिस्ट्रीकरण के लिए फीसों के उद्ग्रहण के लिए उपबन्ध कर सकेंगे ।

(3) राज्य सरकार निदेश दे सकेगी कि इस धारा के अधीन बनाया गया कोई नियम इमारती लकड़ी या अन्य वन-उपज के किसी विनिर्दिष्ट वर्ग को या किसी विनिर्दिष्ट स्थानीय क्षेत्र को लागू नहीं होगा ।

धारा 41a - सीमाशुल्क सीमान्तों के पार इमारती लकड़ी के स्थानान्तरण विषयक केन्द्रीय सरकार की शक्तियां
धारा 41 में किसी बात के होते हुए भी केन्द्रीय सरकार उस मार्ग को विहित करने के लिए नियम बना सकेगी जिसके द्वारा ही इमारती लकड़ी या अन्य वनउपज ऐसे किन्हीं सीमाशुल्क सीमांतों के पास, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा परिनिश्चित हैं,  3[उन राज्यक्षेत्रों में, जिन पर इस अधिनियम का विस्तार है], या उनसे आयात या निर्यात या स्थानान्तरित की जा सकेगी और धारा 41 के अधीन बनाए गए कोई नियम, इस धारा के अधीन बनाए गए नियमों के अधीन रह कर ही प्रभावी होंगे ।]
धारा 42 - धारा 41 के अधीन बनाए गए नियमों के भंग के लिए शास्ति

(1) राज्य सरकार ऐसे नियमों के उल्लंघन के लिए शास्ति के रूप में ऐसी अवधि के लिए कारावास, जो छह मास तक का हो सकेगा, या जुर्माना, जो पांच सौ रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों ऐसे नियमों द्वारा विहित कर सकेगी ।

(2) ऐसे नियम उपबन्ध कर सकेंगे कि उन मामलों में, जिनमें अपराध सूर्यास्त के पश्चात् और सूर्योदय के पूर्व या विधिपूर्ण प्राधिकारी का प्रतिरोध करने के लिए तैयार करने के पश्चात् किया गया है या जहां कि अपराधी उसी प्रकार के अपराध के लिए पहले भी सिद्धदोष हो चुका है, उपधारा (1) में वर्णित शास्तियों से दुगुनी शास्तियां लगाई जा सकेंगी ।

धारा 43 - डिपो में रखी वन-उपज को हुए नुकसान के लिए सरकार या वन अधिकारी उत्तरदायी नहीं होंगे
किसी हानि या नुकसान के लिए, जो किसी इमारती लकड़ी या वनउपज को उस समय हो जाए, जबकि वह धारा 41 के अधीन बनाए गए किसी नियम के अधीन स्थापित किसी डिपो में है, या जब वह इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए अन्यत्र रोक रखा गया है, सरकार उत्तरदायी नहीं होगी, और जब तक कोई वन अधिकारी ऐसी हानि या नुकसान, उपेक्षा, विद्वेष या कपट से नहीं करता है, तब तक वह ऐसी हानि या नुकसान के लिए उत्तरदायी नहीं होगा ।
धारा 44 - डिपो पर दुर्घटना की अवस्था में सब व्यक्ति सहायता करने के लिए आबद्ध होंगे
ऐसे किसी डिपो में किसी सम्पत्ति को संकटापन्न करने वाली दुर्घटना या आपात की दशा में ऐसे डिपो में, चाहे सरकार द्वारा या चाहे किसी प्राइवेट व्यक्ति द्वारा, नियोजित हर व्यक्ति ऐसा संकट टालने या नुकसान या हानि से ऐसी सम्पत्ति को बचाने के लिए उसकी अपनी सहायता मांगने वाले किसी वन अधिकारी या पुलिस अधिकारी को सहयता देगा ।
धारा 45 - कतिपय प्रकार की इमारती लकड़ी, जब तक कि उसके बारे में हक साबित नहीं कर दिया जाता, सरकार की सम्पत्ति समझी जाएगी और तदनुसार संगृहीत की जा सकेगी

(1) बहती हुई, किनारे से लगी हुई, अटकी हुई या डूबी हई सब इमारती लकड़ी, ऐसे सब काष्ठ और इमारती लकड़ी, जिस पर ऐसे चिह्न लगे हैं जो धारा 41 के अधीन बनाए गए नियमों के अनुसार रजिस्ट्रीकृत नहीं हैं, या जिस पर चिह्न अग्नि द्वारा या अन्यथा मिटाए, बदले या बिगाड़े गए हैं, और ऐसे क्षेत्रों में, जैसे राज्य सरकार विनिर्दिष्ट करे, सभी अचिह्नित काष्ठ और इमारती लकड़ी, जब तक कि कोई व्यक्ति इस अध्याय में यथा उपबन्धित रूप में उन पर अपना अधिकार और हक सिद्ध नहीं कर दे, सरकार की सम्पत्ति समझी जाएगी ।

(2) ऐसी इमारती लकड़ी किसी वन अधिकारी या अन्य व्यक्ति द्वारा, जो उसे धारा 51 के अधीन बनाए गए किसी नियम के आधार पर संगृहीत करने का हकदार है, संगृहीत की जा सकेगी और ऐसे किसी डिपो में लाई जा सकेगी जिसे वन अधिकारी बहती हुई इमारती लकड़ी की प्राप्ति के लिए अधिसूचित करे ।

(3) राज्य सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा इमारती लकड़ी के किसी वर्ग को इस धारा के उपबन्धों से छूट दे सकेगी ।

धारा 46 - बहती हुई इमारती लकड़ी के दावेदारों को सूचना
धारा 45 के अधीन संगृहीत इमारती लकड़ी की लोक सूचना वन अधिकारी द्वारा समय-समय पर दी जाएगी । ऐसी सूचना में इमारती लकड़ी का वर्णन अन्तर्विष्ट होगा, और उस इमारती लकड़ी पर दावा करने वाले किसी व्यक्ति से यह अपेक्षा की जाएगी कि तुम ऐसी सूचना की तारीख से दो मास से अन्यून कालावधि के अन्दर ऐसे दावे का लिखित कथन उपस्थित करो ।
धारा 47 - ऐसी इमारती लकड़ी पर किए गए दावे के बारे में प्रक्रिया

(1) जबकि यथापूर्वोक्त जैसा कोई कथन उपस्थित किया जाए, तब वन अधिकारी ऐसी जांच करने के पश्चात्, जिसे वह ठीक समझता है, ऐसा करने के लिए अपने कारणों को अभिलिखित करने के पश्चात् या तो दावे को खारिज कर सकेगा या इमारती लकड़ी का परिदान दावेदार को कर सकेगा ।

(2) यदि एक से अधिक व्यक्तियों द्वारा ऐसी इमारती लकड़ी पर दावा किया जाता है, तो वन अधिकारी या तो उसे ऐसे व्यक्तियों में से किसी को, जिसे वह उसका हकदार समझता है, परिदत्त कर सकेगा, या दावेदारों को सिविल न्यायालयों को निर्देशित कर सकेगा, और ऐसे किसी न्यायालयों से उस इमारती लकड़ी के व्ययन सम्बन्धी आदेश की प्राप्ति के लंबित रहने तक उसे अपने कब्जे में रख सकेगा ।

(3) जिस किसी व्यक्ति का दावा इस धारा के अधीन खारिज किया जा चुका है वह अपने द्वारा दावाकृत इमारती लकड़ी का कब्जा वापिस लेने के लिए वाद ऐसी खारिजी की तारीख से तीन मास के अन्दर संस्थित कर सकेगा, किन्तु कोई व्यक्ति ऐसी खारिजी या किसी इमारती लकड़ी के रोक रखे जाने या हटाने या इस धारा के अधीन अन्य व्यक्ति को इसके परिदान के कारण प्रतिकर या खर्चा सरकार से या किसी वन अधिकारी से वसूल नहीं करेगा ।

(4) जब तक कि ऐसी कोई इमारती लकड़ी परिदत्त नहीं की गई है या इस धारा में यथा उपबन्धित कोई वाद नहीं संस्थित किया गया है, तब तक ऐसी इमारती लकड़ी किसी सिविल, दण्ड या राजस्व न्यायालय की आदेशिका के अधीन नहीं होगी ।

धारा 48 - जिसका दावा नहीं किया गया उस इमारती लकड़ी का व्ययन
यदि यथापूर्वोक्त ऐसा कोई कथन उपस्थित नहीं किया जाता या यदि दावेदार धारा 46 के अधीन निकाली गई सूचना द्वारा नियत रीति से या कालावधि के अन्दर दावा करने का लोप करता है या अपने द्वारा इस प्रकार दावा किए जाने और उस दावे के खारिज किए जाने पर ऐसी इमारती लकड़ी का कब्जा लेने के लिए धारा 47 द्वारा नियत अपर कालावधि के अन्दर वाद संस्थित करने का लोप करता है, तो ऐसी इमारती लकड़ी का स्वामित्व सरकार में या उस दशा में, जिसमें कि ऐसी इमारती लकड़ी धारा 47 के अधीन अन्य व्यक्ति को परिदत्त की गई है, ऐसे व्यक्ति में उन सब विल्लंगमों से मुक्त होकर निहित होगा, जिन्हें उसने सृष्ट नहीं किया है ।
धारा 49 - ऐसी इमारती लकड़ी को हुए नुकसान के लिए सरकार और उसके अधिकारी उत्तरदायी नहीं होंगे
किसी हानि या नुकसान के लिए, जो धारा 45 के अधीन संगृहीत किसी इमारती लकड़ी को हुई या हुआ है, सरकार उत्तरदायी नहीं होगी और जब तक कि कोई वन अधिकारी ऐसी हानि या नुकसान, उपेक्षा, विद्वेष या कपट से नहीं करता, तब तक वह ऐसी किसी हानि या नुकसान के लिए उत्तरदायी नहीं होगा ।
धारा 50 - इमारती लकड़ी के परिदान के पूर्व दावेदार द्वारा की जाने वाली अदायगी
जब तक कि कोई व्यक्ति ऐसी राशि, जो धारा 51 के अधीन बने किसी नियम के अधीन देय है, वन अधिकारी या अन्य व्यक्ति को, जो उसे प्राप्त करने का हकदार है, उसके लिए नहीं चुका देता, जब तक वह उपरोक्त रूप में संगृहीत या परिदत्त इमारती लकड़ी का कब्जा लेने का हकदार नहीं होगा ।
धारा 51 - नियम बनाने और शास्तियां विहित करने की शक्ति

(1) राज्य सरकार निम्नलिखित बातों का विनियमन करने के लिए 1[राजपत्र में अधिसूचना द्वारा नियम बना सकेगी,] अर्थात्ः-

(क) धारा 45 में वर्णित सब इमारती लकड़ी का उद्धारण, संग्रहण और व्ययन,

(ख) इमारती लकड़ी के उद्धारण और संग्रहण के लिए प्रयुक्त नावों का प्रयोग और रजिस्ट्रीकरण,

(ग) ऐसी इमारती लकड़ी के उद्धारण, संग्रहण, स्थानान्तरण, भण्डार में रखने या व्ययन के लिए दी जाने वाली राशियां, और

(घ) ऐसे इमारती लकड़ी को चिह्नित करने के लिए प्रयोग में आने वाले हथौड़े और अन्य उपकरणों का प्रयोग और रजिस्ट्रीकरण ।

(1क) इस अधिनियम के अधीन राज्य सरकार द्वारा बनाया गया प्रत्येक नियम बनाए जाने के पश्चात्, यथाशीघ्र, राज्य विधान-मंडल के समक्ष रखा जाएगा ।

(2) राज्य सरकार इस धारा के अधीन बने किन्हीं नियमों के उल्लंघन के लिए, शास्तियों के रूप में, ऐसी अवधि का कारावास, जो छह मास तक का हो सकेगा, या जुर्माना, जो पांच सौ रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों, विहित कर सकेगी ।

धारा 52 - अधिहरणीय सम्पत्ति का अभिग्रहण

(1) जबकि यह विश्वास करने का कारण है कि किसी वन-उपज के बारे में कोई वन विषयक अपराध किया गया है, जब ऐसी उपज, सब औजारों, नावों, छक़ड़ों या पशुओं सहित, जिनका प्रयोग ऐसे अपराध के करने में हुआ है, किसी वन अधिकारी या पुलिस अधिकारी द्वारा अभिगृहीत की जा सकेगी ।

(2) इस धारा के अधीन किसी सम्पत्ति का अभिग्रहण करने वाला हर अधिकारी ऐसी सम्पत्ति पर यह उपदर्शित करने वाला चिह्न लगाएगा कि उसका इस प्रकार अभिग्रहण हो गया है, और यथाशक्य शीघ्र ऐसे अभिग्रहण की रिपोर्ट उस अपराध का, जिसके कारण अभिग्रहण हुआ है, विचारण करने के लिए अधिकारिता रखने वाले मजिस्ट्रेट को भेजेगाः परन्तु जबकि वह वन-उपज, जिसके बारे में यह विश्वास है कि ऐसा अपराध हुआ है, सरकार की सम्पत्ति है, और अपराधी अज्ञात है, तब यदि यथाशक्य शीघ्र अधिकारी परिस्थितियों के बारे में रिपोर्ट अपने पदीय वरिष्ठ को दे देता है, तो वह पर्याप्त होगा ।

धारा 53 - धारा 52 के अधीन अभिगृहीत सम्पत्ति को निर्मुक्त करने की शक्ति
रेंजर से अनिम्न पंक्ति वाला वन अधिकारी, जिसने या जिसके अधीनस्थ ने कोई औजार, नावें, छकड़े या ढोर धारा 52 के अधीन अभिगृहीत किए हैं, उन्हें उनके स्वामी द्वारा ऐसे बन्धपत्र निष्पादित किए जाने पर निर्मुक्त कर सकेगा कि यदि और जब मुझ से ऐसी अपेक्षा की जाएगी, तो और तब मैं इस प्रकार निर्मुक्त सम्पत्ति उस मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश कर दूंगा जिसको उस अपराध का, जिसके कारण अभिग्रहण हुआ है, विचारण करने की अधिकारिता प्राप्त है ।
धारा 54 - तदुपरि प्रक्रिया
ऐसी किसी रिपोर्ट की प्राप्ति पर मजिस्ट्रेट सब सुविधापूर्ण शीघ्रता से, ऐसे उपाय करेगा जो अपराधी की गिरफ्तारी और विचारण और सम्पत्ति का विधि के अनुसार व्ययन के लिए आवश्यक हों ।
धारा 55 - वन-उपज, औजार आदि कब अधिहरणीय होंगे

(1) ऐसी सब इमारती लकड़ी या वन-उपज, जो सरकार की सम्पत्ति नहीं है, और जिसके विषय में वन अपराध किया गया है, और ऐसे वन विषयक अपराध के करने में प्रयुक्त सब औजार, नावें, छकड़े और पशु अधिहरणीय होंगे ।

(2) ऐसा अधिहरण, ऐसे अपराध के लिए विहित किसी अन्य दण्ड के अतिरिक्त हो सकेगा ।

धारा 56 - वन-अपराध के लिए हुए विचारण की समाप्ति पर, उस वन-उपज का व्ययन जिसके सम्बन्ध में यह अपराध हुआ है
जब किसी वन विषयक अपराध का विचारण समाप्त हो जाता है, तब यदि वह वनउपज, जिसके संबंध में ऐसा अपराध हुआ है, सरकार की सम्पत्ति है या उसका अधिहरण हुआ है, तो वह वन अधिकारी द्वारा अपने भारसाधन में ले ली जाएगी, और किसी अन्य दशा में, उसका ऐसी रीति से व्ययन किया जा सकेगा, जैसी न्यायालय निर्दिष्ट करे ।
धारा 57 - जब अपराधी अज्ञात है, या पाया न जा सके, तब प्रक्रिया
जब कि अपराधी अज्ञात है या पाया नहीं जा सकता, तब यदि मजिस्ट्रेट का यह निष्कर्ष है कि कोई अपराध किया गया है, तो वह यह आदेश दे सकेगा कि जिस सम्पत्ति के संबंध में अपराध हुआ है, वह अधिहृत की जाए और वन अधिकारी द्वारा अपने भारसाधन में ले ली जाए या उस व्यक्ति को दे दी जाए जिसे मजिस्ट्रेट उसका हकदार समझता हैः

परन्तु जब तक कि ऐसी सम्पत्ति के अभिग्रहण की तारीख से एक मास का अवसान न हो गया हो, या उस पर किसी अधिकार का दावा करने वाले व्यक्ति की, यदि कोई हो, और ऐसे साक्ष्य की, यदि कोई हो, जिसे वह अपने दावे के समर्थन में पेश करे, सुनवाई नहीं हो जाती है, तब तक ऐसा कोई आदेश नहीं दिया जाएगा ।

धारा 58 - धारा 52 के अधीन अभिगृहीत विनश्वर सम्पत्ति विषयक प्रक्रिया
मजिस्ट्रेट धारा 52 के अधीन अभिगृहीत और शीघ्र और प्रकृत्या क्षयशील सम्पत्ति के विक्रय के लिए इसमें इसके पूर्व अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी निदेश दे सकेगा और आगमों से इस प्रकार बरत सकेगा, जिस प्रकार वह ऐसी सम्पत्ति से तब बरतता जबकि वह बेची न गई होती ।
धारा 59 - धारा 55, धारा 56 या धारा 57 के अधीन आदेशों की अपील
वह अधिकारी, जिसने धारा 52 के अधीन अभिग्रहण किया है, या उसके पदीय वरिष्ठों में से कोई या इस प्रकार अभिगृहीत सम्पत्ति में हितबद्ध होने का दावा करने वाला कोई व्यक्ति, धारा 55, धारा 56 या धारा 57 के अधीन पारित किए गए किसी आदेश की तारीख से एक मास के अन्दर, उस आदेश की अपील उस न्यायालय में कर सकेगा जिसमें ऐसे मजिस्ट्रेट द्वारा दिए गए आदेशों की अपील मामूली तौर से होती है, और ऐसी अपील पर पारित आदेश अन्तिम होगा ।
धारा 60 - सम्पत्ति कब सरकार में निहित होगी
जब कि, यथास्थिति, धारा 55 या धारा 57 के अधीन किसी सम्पत्ति के अधिहरण के लिए आदेश पारित किया जा चुका है, और ऐसे आदेश की अपील के लिए धारा 59 द्वारा परिसीमित कालावधि बीत गई है, और ऐसी कोई अपील नहीं की गई है, या जबकि ऐसी अपील के किए जाने पर अपील न्यायालय, ऐसी सम्पूर्ण सम्पत्ति या उसके किसी प्रभाग के बारे में, ऐसे आदेश की पुष्टि करता है, तो, यथास्थिति, ऐसी सम्पूर्ण सम्पत्ति या उसका ऐसा कोई प्रभाग सब विल्लंगमों से मुक्त होकर सरकार में निहित होगा ।
धारा 61 - अभिगृहीत सम्पत्ति को निर्मुक्त करने की शक्ति की व्यावृत्ति
इसमें इसके पूर्व अन्तर्विष्ट किसी बात की बाबत यह नहीं समझा जाएगा कि वह राज्य सरकार द्वारा इस निमित्त सशक्त अधिकारी को ऐसी सम्पत्ति को तुरन्त निर्मुक्त करने का निदेश देने से निवारित करती है जो धारा 52 के अधीन अभिगृहीत की गई है ।
धारा 62 - दोषपूर्ण अभिग्रहण के लिए दण्ड
जो कोई वन अधिकारी या पुलिस अधिकारी तंग करने के लिए और अनावश्यक रूप से किसी सम्पत्ति का अभिग्रहण इस बहाने करता है कि ऐसी अभिगृहीत सम्पत्ति इस अधिनियम के अधीन अधिहरणीय है, वह उस अवधि के लिए कारावास से, जो छह मास तक की हो सकेगी या जुर्माने से, जो पांच सौ रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दण्डनीय होगा ।
धारा 63 - वृक्षों और इमारती लकड़ी पर चिह्नों के कूटकरण करने और उन्हें विरूपित करने और सीमा चिह्नों को बदलने के लिए शास्ति

जो लोक या किसी व्यक्ति को नुकसान या क्षति पहुंचाने या भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) में यथापरिभाषित सदोष लाभ के आशय से-

(क) जानबूझकर किसी इमारती लकड़ी या खड़े वृक्ष पर किसी ऐसे चिह्न का कूटकरण करेगा जिसे वन अधिकारी यह उपदर्शित करने के लिए प्रयोग करते हैं कि ऐसी इमारती लकड़ी या वृक्ष सरकार या किसी व्यक्ति की सम्पत्ति है, या उसे किसी व्यक्ति द्वारा विधितः काटा या हटाया जा सकेगा, या

(ख) किसी वन अधिकारी के प्राधिकार द्वारा या उसके अधीन किसी वृक्ष या इमारती लकड़ी पर लगे किसी ऐसे चिह्न को बदलेगा, विरूपित करेगा या मिटाएगा, या

(ग) किसी वन या बंजर भूमि के, जिसको इस अधिनियम के उपबन्ध लागू होते हैं, सीमा-चिह्न को बदलेगा, सरकाएगा, नष्ट करेगा या विरूपित करेगा,

वह कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से, दण्डनीय होगा ।

धारा 64 - वारंट के बिना गिरफ्तार करने की शक्ति

(1) ऐसे किसी व्यक्ति को, जिसके विरुद्ध यह युक्तियुक्त संदेह विद्यमान है कि वह एक मास या उससे अधिक के कारावास से दण्डनीय किसी वन विषयक अपराध से सम्पृक्त है, कोई वन अधिकारी या पुलिस अधिकारी किसी मजिस्ट्रेट के आदेशों के और किसी वांरट के बिना गिरफ्तार कर सकेगा ।

(2) इस धारा के अधीन गिरफ्तार करने वाला हर अधिकारी किसी अनावश्यक विलम्ब के बिना और बन्धपत्र पर निर्मुक्त करने संबंधी अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए, गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को ऐसे मजिस्ट्रेट के, जिसे इस मामले में अधिकारिता प्राप्त है, समक्ष या निकटतम पुलिस स्टेशन के भारसाधक अधिकारी के पास ले जाएगा या भेजेगा ।

(3) इस धारा की किसी बात की बाबत यह नहीं समझा जाएगा कि वह ऐसे कार्य के लिए, जो अध्याय 4 के अधीन अपराध है, ऐसी गिरफ्तारी करने के लिए प्राधिकृत करती है, जब तक कि धारा 30 के खण्ड (ग) के अधीन ऐसा कार्य प्रतिषिद्ध न कर दिया गया हो ।

धारा 65 - किसी गिरफ्तार व्यक्ति को बन्ध-पत्र पर निर्मुक्त करने की शक्ति

रेंजर से अनिम्न पंक्ति का कोई वन अधिकारी, जिसने या जिसके अधीनस्थ ने, धारा 64 के उपबन्धों के अधीन किसी व्यक्ति को गिरफ्तार किया है, ऐसे व्यक्ति को उस द्वारा यह बन्धपत्र निष्पादित कर दिए जाने पर निर्मुक्त कर सकेगा कि यदि और जब अपेक्षा की जाएगी, तो और तब मैं मामले के बारे में अधिकारिता प्राप्त मजिस्ट्रेट के समक्ष या निकटतम पुलिस स्टेशन के भारसाधक अधिकारी के समक्ष, उपसंजात हो जाऊंगा । ।

धारा 66 - अपराधों का किया जाना निवारित करने की शक्ति
हर वन अधिकारी और पुलिस अधिकारी किसी वन विषयक अपराध के किए जाने को निवारित करेगा और उसे निवारित करने के प्रयोजन के लिए हस्तक्षेप कर सकेगा ।
धारा 67 - अपराधों का संक्षिप्ततः विचारण करने की शक्ति
जिला मजिस्ट्रेट या राज्य सरकार द्वारा इस निमित्त विशेषतया सशक्त कोई प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1898(1898 का 5) के अधीन किसी ऐसे वन विषयक अपराध का विचारण संक्षिप्ततः कर सकेगा, जो छह मास से अनधिक कारावास या पांच सौ रुपए से अनधिक जुर्माने से, या दोनों से दण्डनीय है ।
धारा 68 - अपराधों का शमन करने की शक्ति

(1) राज्य सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, किसी वन अधिकारी को शक्ति प्रदान कर सकेगी कि वह-

(क) किसी ऐसे व्यक्ति से, जिसके विरुद्ध ऐसा युक्तियुक्त संदेह विद्यमान है कि उसने धारा 62 या धारा 63 में विनिर्दिष्ट किसी अपराध से भिन्न कोई वन विषयक अपराध किया है, उस अपराध के लिए जिसके बारे में यह संदेह है कि उसने ऐसा अपराध किया है, प्रतिकर के रूप में कोई धनराशि प्रतिगृहीत कर ले, और

(ख) जब कोई सम्पत्ति अधिहरणीय होने के नाते अभिगृहीत की गई है, तब ऐसे अधिकारी द्वारा यथा प्राक्कलित उसके मूल्य के दे दिए जाने पर उस सम्पत्ति को निर्मुक्त कर दे ।

(2) ऐसे अधिकारी के, यथास्थिति, ऐसी धनराशि, या मूल्य या दोनों के दे दिए जाने पर संदिग्ध व्यक्ति को यदि वह अभिरक्षा में है, उन्मोचित कर दिया जाएगा, और वही सम्पत्ति, यदि कोई हो, जो अभिगृहीत की गई है, निर्मुक्त कर दी जाएगी तथा ऐसे व्यक्ति या ऐसी सम्पत्ति के विरुद्ध आगे कोई कार्यवाही नहीं की जाएगी ।

(3) इस धारा के अधीन किसी वन अधिकारी को उस दशा में ही शक्ति प्रदत्त की जाएगी जब कि वह रेंजर से अनिम्न पंक्ति का वन अधिकारी नहीं है और कम से कम सौ रुपए मासिक वेतन पाता है, और उपधारा (1) के खण्ड (क) के अधीन प्रतिकर के रूप में प्रतिगृहीत धनराशि किसी भी दशा में पचास रुपए से अधिक नहीं है ।

धारा 69 - यह उपधारणा कि वन-उपज सरकार की है
जबकि इस अधिनियम के अधीन की गई किसी कार्यवाही में, या इस अधिनियम के अधीन किए गए किसी कार्य के परिणामस्वरूप ऐसा प्रश्न उठता है कि क्या कोई वन-उपज सरकार की सम्पत्ति है या नहीं, तब, जब तक कि प्रतिकूल साबित न कर दिया जाए, ऐसी उपज के बारे में यह उपधारणा की जाएगी कि वह सरकार की सम्पत्ति है ।
धारा 70 - पशु अतिचार अधिनियम, 1871 का लागू होना
किसी आरक्षित वन में या किसी संरक्षित वन के किसी प्रभाग में, जो विधिपूर्णतः चरागाह के लिए बन्द किया गया है, अतिचार करने वाले पशुओं को पशु अतिचार अधिनियम, 1871 (1871 का 1) की धारा 11 के अर्थ में लोक बागान को नुकसान करने वाला पशु समझा जाएगा और किसी वन अधिकारी या पुलिस अधिकारी द्वारा उन्हें अभिगृहीत और परिबद्ध किया जा सकेगा ।
धारा 71 - उस नियम के अधीन नियत जुर्मानों को बदलने की शक्ति

राज्य सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, निदेश दे सकेगी कि पशु अतिचार अधिनियम, 1871 (1871 का 1) की धारा 12 के अधीन नियत जुर्मानों के बदले में, इस अधिनियम की धारा 70 के अधीन परिबद्ध हर पशु के लिए ऐसा जुर्माना उद्गृहीत किया जाएगा जैसा कि वह ठीक समझती है, किन्तु वह निम्नलिखित से अधिक नहीं होगा, अर्थात्ः-

हर हाथी के लिए………………………………………………………………………………………………..दस रुपए

हर भैंस या ऊंट के लिए………………………………………………………………………………………….दो रुपए

हर घोड़े, खस्सी, पशु, टट्टू, बछेड़े, बछेड़े, खच्चर, सांड, बैल, गाय या बछेड़ी के लिए……………………..एक रुपए

हर बछड़े, गधे, सूअर, मेढे, भेड़, मेमने, बकरी या उसके मेमनों के लिए……………………………………आठ आने ।

धारा 72 - राज्य सरकार वन अधिकारियों में कतिपय शक्तियां विनिहित कर सकेगी

(1) राज्य सरकार किसी वन अधिकारी में निम्नलिखित सब शक्तियां या उनमें से कोई शक्ति विनिहित कर सकेगी, अर्थात्ः-

(क) किसी भूमि पर जाने और उसका सर्वेक्षण, सीमांकन और नक्शा तैयार करने की शक्ति,

(ख) साक्षियों को हाजिर होने के लिए और दस्तावेजों और सारवान् वस्तुओं को पेश करने के लिए विवश करने वाली सिविल न्यायालय की शक्तियां,

(ग) दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1898 (1898 का 5) के अधीन तलाशी वारंट निकालने की शक्ति, और

(घ) वन विषयक अपराधों की जांच और ऐसी जांच के दौरान साक्ष्य लेने और उसे अभिलिखित करने की शक्ति ।

(2) उपधारा (1) के खण्ड (घ) के अधीन अभिलिखित कोई साक्ष्य मजिस्ट्रेट के सामने किसी पश्चात्वर्ती विचारण में ग्राह्य होगा, परन्तु यह तब जबकि अभियुक्त व्यक्ति की उपस्थिति में वह साक्ष्य लिया गया हो ।

धारा 73 - वन अधिकारियों को लोक सेवक समझा जाएगा
सभी वन अधिकारियों को भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) के अर्थान्तर्गत लोक सेवक समझा जाएगा ।
धारा 74 - सद्भावपूर्वक किए गए कार्यों के लिए परित्राण
इस अधिनियम के अधीन लोक सेवक द्वारा सद्भावपूर्वक किए गए किसी कार्य के लिए उसके विरुद्ध कोई वाद नहीं चलाया जाएगा ।
धारा 75 - वन अधिकारी व्यापार नहीं करेंगे
राज्य सरकार की लिखित अनुज्ञा के बिना, कोई वन अधिकारी मालिक या अभिकर्ता के रूप में इमारती लकड़ी या अन्य वनउपज का व्यापार नहीं करेगा, या किसी वन के पट्टे में या किसी वन के ठेके में हितबद्ध नहीं होगा या बनेगा या चाहे ये बातें 1[उन राज्यक्षेत्रों के, जिन पर यह अधिनियम विस्तारित होता है], अन्दर हों या बाहर हों ।
धारा 76 - नियम बनाने की अतिरिक्त शक्तियां

राज्य सरकार निम्नलिखित के लिए नियम बना सकेगी-

(क) इस अधिनियम के अधीन किसी वन अधिकारी की शक्तियों और कर्तव्यों को विहित और सीमित करने के लिए,

(ख) इस अधिनियम के अधीन जुर्माना और अधिहरण के आगमों में से अधिकारियों और भेदियों को दिए जाने वाले पुरस्कारों का विनियमन करने के लिए,

(ग) सरकार के वृक्षों और इमारती लकड़ी का, जो प्राईवेट व्यक्तियों की भूमियों में उगे हुए हैं या उनके अधिभोग में हैं, संरक्षण, पुनरुत्पादन और व्ययन करने के लिए, और

(घ) साधारणतः इस अधिनियम के उपबन्धों को क्रियान्वित करने के लिए ।

धारा 77 - नियमों के भंग के लिए शास्तियां
इस अधिनियम के अधीन किसी नियम को, जिसके उल्लंघन के लिए कोई विशेष शास्ति उपबन्धित नहीं है, भंग करने वाला कोई व्यक्ति ऐसी अवधि के कारावास से, जो एक मास तक का हो सकेगा, या जुर्माने से, जो पांच सौ रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दण्डनीय होगा ।
धारा 78 - नियमों को कब विधि का बल प्राप्त होता है
इस अधिनियम के अधीन राज्य सरकार द्वारा बनाए गए सभी नियम राजपत्र में प्रकाशित किए जाएंगे, और तदुपरि, जहां तक वे इस अधिनियम से सुसंगत हैं, वहां तक वे इस प्रकार प्रभावशील होंगे, मानो वे इसमें अधिनियमित हुए हैं ।
धारा 79 - वन अधिकारियों और पुलिस अधिकारियों को सहायता देने के लिए आबद्ध व्यक्ति

(1) ऐसा हर व्यक्ति, जो किसी आरक्षित या संरक्षित वन में किसी अधिकार का प्रयोग करता है, या ऐसे वन से किसी वन-उपज को लेने, या इमारती लकड़ी काटने और हटाने या उसमें ढोर चराने के लिए अनुज्ञात है, और हर व्यक्ति, जो ऐसे वन में किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा नियोजित है, और ऐसे वन से समीपस्थ किसी ग्राम का हर व्यक्ति, जो सरकार द्वारा नियोजित है या जो समुदाय के प्रति की जाने वाली सेवाओं के लिए, सरकार से उपलब्धियां पाता है, ऐसी जानकारी, जो किसी वन विषयक अपराध के किए जाने या किए जाने के आशय के विषय में उसके पास है, निकटतम वन अधिकारी या पुलिस अधिकारी को अनाश्यक विलम्ब के बिना देने के लिए आबद्ध होगा, और-

(क) ऐसे वन में किसी वन अग्नि को, जिसके बारे में उसे ज्ञान या जानकारी है, बुझाने के लिए,

(ख) ऐसे वन के सामीप्य में की किसी अग्नि को, जिसका उसे ज्ञान या जानकारी है, अपनी शक्ति के अनुसार किन्हीं वैध साधनों द्वारा ऐसे वन में फैल जाने से रोकने के लिए, तुरन्त कार्यवाही करेगा चाहे उससे किसी वन अधिकारी या पुलिस अधिकारी द्वारा ऐसी अपेक्षा की गई हो या नहीं, और

(ग) ऐसे वन में वन विषयक अपराध को रोकने, और

(घ) जबकि यह विश्वास करने का कारण है कि ऐसे वन में ऐसा कोई अपराध किया गया है, तब अपराधी का पता चलाने और उसे गिरफ्तार करने में, उसकी सहायता मांगने वाले किसी वन अधिकारी या पुलिस अधिकारी की सहायता करेगा ।

(2) जो कोई व्यक्ति ऐसा करने के लिए आबद्ध होते हुए विधिपूर्ण प्रतिहेतु के बिना (जिसे साबित करने का भार ऐसे व्यक्ति पर होगा-

(क) उपधारा (1) द्वारा अपेक्षित जानकारी निकटतम वन अधिकारी या पुलिस अधिकारी को अनावश्यक विलम्ब के बिना नहीं देगा,

(ख) किसी आरक्षित या संरक्षित वन में वन अग्नि को बुझाने के लिए उपधारा (1) द्वारा यथा अपेक्षित कार्यवाही नहीं करेगा,

(ग) ऐसे वन के सामीप्य में की किसी अग्नि को ऐसे वन में फैलने से नहीं रोकेगा जैसा कि उपधारा (1) द्वारा अपेक्षित है, या

(घ) ऐसे वन में किसी वन अपराध का किया जाना रोकने में या उस दशा में जिसमें कि यह विश्वास करने का कारण है कि ऐसे वन में ऐसा कोई अपराध हुआ है, अपराधी का पता चलाने और उसे गिरफ्तार करने में उसकी सहायता मांगी जाने पर किसी वन अधिकारी या पुलिस अधिकारी की मदद नहीं करेगा, वह ऐसी अवधि के कारावास से, जो एक मास तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, जो दो सौ रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दण्डनीय होगा ।

धारा 80 - उन वनों का प्रबन्ध जो सरकार और अन्य व्यक्तियों की संयुक्त सम्पत्ति है

(1) यदि सरकार और कोई व्यक्ति किसी वन या बंजर भूमि में, या उसकी पूरी उपज या उसके किसी भाग में संयुक्ततः हितबद्ध है, तो राज्य सरकार या तो-

(क) उसमें ऐसे व्यक्ति को उसके हित के लिए लेखा देते रहते हुए, ऐसे वन, बंजर भूमि या उपज का प्रबन्ध अपने हाथ में ले लेगी, या

और उसमें के सब पक्षकारों के हितों में आवश्यक समझती है ।

(2) जब कि उपधारा (1) के खण्ड (क) के अधीन सरकार किसी वन, बंजर भूमि या उपज का प्रबन्ध अपने हाथ में लेती है, तब वह राजपत्र में अधिसूचना द्वारा यह घोषित कर सकेगी कि ऐसे वन, बंजर भूमि या उपज को अध्याय 2 और 4 में अन्तर्विष्ट कोई उपबन्ध लागू होंगे और तदुपरि ऐसे उपबन्ध तदनुसार लागू होंगे ।

धारा 81 - ऐसी सेवा करने में असफलता जिसके लिए सरकारी वन में की उपज के किसी अंश का उपभोग किया जाता है
यदि कोई व्यक्ति, किसी ऐसे वन की उपज का, जो सरकार की सम्पत्ति है, या जिस पर सरकार का साम्पत्तिक अधिकार है या वन-उपज के किसी भाग के, जिसकी सरकार हकदार है, अंश का इस शर्त पर हकदार है, कि ऐसे वन से सम्बन्धित सेवा वह सम्यक् रूप से करता रहे, तो राज्य सरकार का समाधान कर देने वाले रूप में यह तथ्य सिद्ध हो जाने की दशा में कि ऐसी सेवा अब नहीं की जा रही है, ऐसा अंश अधिहरणीय हो जाएगाः परन्तु जब तक कि राज्य सरकार द्वारा इस निमित्त सम्यक् रूप से नियुक्त अधिकारी द्वारा उसके हकदार व्यक्ति की, और ऐसे साक्ष्य की, यदि कोई हो, जिसे वह ऐसी सेवा के सम्यक् रूप से किए जाने के सबूत में पेश करे, सुनवाई न की गई हो, तब तक ऐसे किसी अंश का अधिकरण नहीं होगा ।
धारा 82 - सरकार को शोध्य धन की वसूली
इस अधिनियम या इस अधिनियम के अधीन बनाए गए किसी नियम के अधीन या किसी वन-उपज की कीमत या ऐसी उपज के सम्बन्ध में इस अधिनियम के निष्पादन में उपगत व्ययों के कारण सरकार को देय सब धन, यदि शोध्य होने पर न दिए गए हों, तत्समय प्रवृत्त विधि के अनुसार ऐसे वसूल किए जा सकेंगे मानो वे भू-राजस्व की बकाया हों ।
धारा 83 - ऐसे धन के लिए वन-उपज पर धारणाधिकार

(1) जब कि किसी वन-उपज के लिए या उसके सम्बन्ध में ऐसा कोई धन देय है, तब उसकी राशि ऐसी उपज पर प्रथम भार समझी जाएगी, और जब तक कि ऐसी राशि चुका नहीं दी जाए तब तक के लिए ऐसी उपज-वन अधिकारी द्वारा अपने कब्जे में ली जा सकेगी ।

(2) यदि जब यह राशि शोध्य होती है तब चुका नहीं दी जाती है, तो वन अधिकारी ऐसी उपज का लोक नीलाम द्वारा विक्रय कर सकेगा और विक्रय के आगमों को प्रथमतः ऐसी राशि को चुकाने में प्रयुक्त किया जाएगा ।

(3)यदि कोई अतिशेष रहे, तो उस दशा में जिसमें कि उसके लिए हकदार व्यक्ति द्वारा दावा विक्रय की तारीख से दो मास के अन्दर नहीं किया जाता, वह सरकार को समपहृत हो जाएगा ।

धारा 84 - इस अधिनियम के अधीन अपेक्षित भूमि की बाबत यह समझा जाना कि उसकी आवश्यकता भूमि अर्जन अधिनियम, 1894 के अधीन लोक प्रयोजन के लिए है
जब कभी राज्य सरकार को ऐसा प्रतीत होता है कि इस अधिनियम के प्रयोजनों में से किसी प्रयोजन के लिए कोई भूमि अपेक्षित है, तो ऐसी भूमि के बारे में यह समझा जाएगा कि भूमि अर्जन अधिनियम, 1894 (1894 का 1) की धारा 4 के अर्थ के अन्दर उसकी लोक प्रयोजन के लिए आवश्यकता है ।
धारा 85 - बन्धपत्र के अधीन शोध्य शास्तियों की वसूली
जबकि कोई व्यक्ति, इस अधिनियम के किसी उपबन्ध के अनुसार या उसके अधीन बनाए गए किसी नियम के अनुपालन में, किसी बन्धपत्र या लिखत द्वारा किसी कर्तव्य या कार्य के पालन के लिए, अपने को आबद्ध करता है, या किसी बन्धपत्र या लिखत द्वारा प्रसंविदा करता है कि मैं या मैं और मेरे सेवक और अभिकर्तागण किसी कार्य से प्रविरत रहेंगे, तब भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 (1872 का 9) की धारा 74 में किसी बात के होते हुए भी ऐसे बन्धपत्र या लिखत में जो राशि उसकी शर्तों के भंग होने की दशा में दी जाने वाली राशि के रूप में वर्णित है, ऐसे भंग होने की दशा में उस समस्त राशि को ऐसे वसूल किया जा सकेगा मानो वह राशि भू-राजस्व की बकाया हो ।
धारा 85a - केन्द्रीय सरकार के अधिकारों के लिए व्यावृत्ति
इस अधिनियम की कोई बात, किसी राज्य सरकार को, उस राज्य में निहित न हुई सम्पत्ति के सम्बन्ध में कोई आदेश देने या कोई कार्य करने के लिए या सम्पृक्त सरकार की सम्मति के बिना केन्द्रीय सरकार या किसी अन्य राज्य सरकार के किन्हीं अधिकारों पर अन्यथा प्रतिकूल प्रभाव डालने के लिए प्राधिकृत नहीं करेगी ।
धारा 86 - निरसन
निरसन और संशोधन अधिनियम, 1948 (1948 का 2) की धारा 2 और अनुसूची द्वारा निरसित ।
Updated: August 26, 2020 — 2:14 pm

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *